एएमयू के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी और उर्दू एकेडमी के निदेशक डॉ. राहत अबरार कहते हैं कि सर सैयद डे पर डिनर की परंपरा वर्ष 1913-14 में शुरू हुई थी। पहले एसएस हॉल में सामूहिक दावत होती थी। 90 के दशक में विद्यार्थियों की तादाद बढ़ने से सामूहिक दावत एएमयू के क्रिकेट पवेलियन पर होने लगी। जहां हॉल के नाम से अलग-अलग पंडाल लगते थे। विद्यार्थियों की संख्या और हॉल बढ़ने से करीब वर्ष 2000 के बाद हॉल में ही खाना खाने की परंपरा शुरू हुई। कोरोना काल में दो साल तक हॉल में भोजन नहीं हो सका।
बड़ा खाना की खास बातें
- 20 हॉल में दस्तरखान
- 890 बकरे कटे
- 65 क्विंटल बकरे का कोरमा
- 35 क्विंटल बकरे की बिरयानी
- 7 क्विंटल मुर्गे का कोरमा (गर्ल्स हॉस्टल)
- 90 क्विंटल शाही टुकड़ा बना
- 45 हजार विद्यार्थी और शिक्षक व मेहमान हुए शामिल