जब जिंदगी कदम कदम पर मुश्किलें खड़ी कर रही हो तो बात आसान नहीं होती। लेकिन जब मुश्किलों का ही सहारा लेकर आगे बढ़ने की राह बन जाए तो फिर बात ही कुछ और हो जाती है।
ऐसा ही किया एटा बाईपास के शताब्दी नगर में रहने वाली शालिनी मित्तल ने। पति के एक्सीडेंट के बाद जब घर में आर्थिक तंगी हुई तो पुरुषों के प्रभाव वाला काम समझे जाने वाले (प्रोविजन स्टोर सेल्समैन) काम को हाथ में लिया। पति की मोपेड उठाई और वही काम शुरू कर दिया। अब परिश्रम के आगे परिवार की मुसीबतें ठहर नहीं सकती थीं। लेकिन यहां तक पहुंचने की राह इतनी भी आसन नहीं थी। बचपन में ही अपनी मां विमलेश गुप्ता(बरला बाईपास) को खोने के बाद शालिनी मित्तल की जिंदगी आसान न थी।
दादा रामबहादुर गुप्ता और दादी जलधारा ने परवरिश की। किसी तरह पारिवारिक जीवन में कदम रखा और जिंदगी बस चल रही थी। लेकिन एक वक्त ऐसा आया कि डेली नीड्स सप्लाई करने वाले सेल्समैन पति मनोज मित्तल का एक्सीडेंट हुआ तो घर में और भी आर्थिक तंगी आ गई। एकमात्र बेटी खुशी की फीस अदा करनी थी। लेकिन किसी से पैसा मांगना जमीर को गवारा नहीं था। यूं ही एक दिन उधेड़बुन चल रही थी कि पति की रखी हुई मोपेड पर नजर गई और रास्ता दिख गया। अगले दिन मोपेड उठाई। दोदपुर से सप्लाई ली और केला नगर चौराहे से पीएसी तक के इलाके में सामान देना शुरू कर दिया। दुकानदारों ने भी शालिनी के हौसले का सम्मान किया। धीरे धीरे सारा काम समझ में आ गया। जल्द ही परिवार की हालत भी सुधरने लगी। बेटी को विजडम पब्लिक स्कूल में एडमिशन कराया। जल्द ही एक टिफिन सेंटर भी खोल लिया जिसमें पति भी हाथ बंटाने लगे। अब इन शालिनी और मनोज की एक ही ख्वाहिश है कि बेटी खुशी पढ़ लिख कर कुछ बन जाए।