मुरादाबाद और लखीमपुर खीरी में आर्सेनिक युक्त सल्फाइड खनिजों का ऑक्सीकरण मिला है। गाजीपुर में आर्सेनोलाइट खनिज विघटन मिला तो बलिया में ऑक्सीहाइड्रॉक्साइड की कमी है और रिडक्टिव विघटन है। शोध में नैनोटेक्नोलॉजी और नैनो कणों से आर्सेनिक व अन्य विषाक्त धातु हटाने के लिए अध्ययन किया गया है। पानी से आर्सेनिक हटाने, खासकर नैनो प्रौद्योगिकी पर काम करने की जरूरत बताई गई है। शोधकर्ताओं का कहना है कि आर्सेनिक के स्तर का तेजी से पता लगाने के लिए नोमटेरियल-आधारित सेंसर और बायोसेंसर एप्टामर का इस्तेमाल किया जा सकता है।
एएमयू के डॉ. सलमान अहमद ने बताया कि डॉ. वजाहत सुल्तान के निर्देशन में यह अध्ययन और रिव्यू किया गया। इसमें पाया गया है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा 10 पीबीपी को पार कर खतरनाक स्तर पर आर्सेनिक पहुंच चुका है। भारत में बिहार और झारखंड में यह 50 पीबीपी तक मिला है।
आर्सेनिक के संपर्क में आने से होने वाली बीमारी को आर्सेनिकोसिस का नाम दिया गया है। इसका पहला मामला 1996 में बांग्लादेश में मिला था। तब से यह दुनियाभर में फैल गया। भारत में आर्सेनिक के कारण त्वचा संक्रमण का पहला मामला 1983 में कोलकाता में पाया गया। इंटरनेशनल एजेंसी फ़ॉर रिसर्च ऑन कैंसर(आईएआरसी) ने अमेरिका, बांग्लादेश, भारत, चिली और अन्य देशों में किए शोध में पाया कि लंबे समय तक आर्सेनिक के संपर्क में रहने से त्वचा, मूत्राशय और फेफड़ों में मेलेनोमा को बढ़ावा मिल सकता है।
भारत में स्थिति
जून 2002 में बिहार के भोजपुर डिवीजन के सेमरिया ओझा पट्टी गांव में मीठे पानी के आर्सेनिक से दूषित होने की बात सामने आई थी। यहां तीन वर्षों के अध्ययन में पाया गया कि 9597 नमूनों में से 23 प्रतिशत में इसकी मात्रा 50 ग्राम तक थी। 4513 लोगों में से 525 (5.5 प्रतिशत) को शरीर में समस्याएं थीं।
झारखंड में स्थिति
झारखंड के शाहिबगंज जिले में आर्सेनिक का स्तर 50 ग्राम लीटर से अधिक था। अब तक 17 गांवों में अध्ययन किए गए 1024 पानी के नमूनों में से 19.4 प्रतिशत में मात्रा 50 ग्राम/लीटर से अधिक है। 320 लोगों में 87 को आर्सेनिक त्वचा संक्रमण का पता चला है।
हरियाणा और पंजाब में स्थिति
हरियाणा के कई स्थानों पर मीठे पानी में आर्सेनिक का स्तर 50 पीबीपी से अधिक है। यमुना नदी और उसके किनारे, जो हिमालय की तराई में है, वह आर्सेनिक प्रभावित जल को आगे बढ़ा रहे हैं। पंजाब में पंजाब के 12 स्थानों पर इसका स्तर 10 पीपीबी से अधिक पाया गया। ये रावी और ब्यास नदी चैनलों के किनारे स्थित हैं।