कानून व्यवस्था और आपराधिक गतिविधियों को लेकर अक्सर चर्चाओं में रहे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इतिहास पर पहली बार एक और बदनुमा दाग लग गया। शनिवार रात यह पहला मौका रहा, जब छात्र गुटों में भिड़ंत के दौरान ताबड़तोड़ फायरिंग हुई और दो पूर्व छात्रों की जान चली गई। इस घटना को देख लोगों ने कुलपति महमूर्दउरहमान के कार्यकाल की वर्ष 1998 को जरूर याद किया, जब पुलिस को इसी तरह कैंपस में घुसकर फायरिंग करनी पड़ गई और उस फायरिंग में एएमयू स्टाफ क्लब के पास आफताब नाम के छात्र की जान गई। मगर ऐसा आज तक नहीं हुआ कि दो गुट इस तरह आमने-सामने आए और एक साथ दो जान चली गईं।
लंबे समय से शांत पड़े कैंपस में सितंबर 2015 में डीएसडब्ल्यू छात्र आलमगीर की हत्या के बाद ऐसा लगा था कि कहीं कैंपस के अमन को पलीता न लग जाए। हालांकि छुटपुट फायरिंग, झगड़े होते रहे। मगर छात्र गुटों को ऐसा मौका नहीं लगा कि माहौल बिगड़े। आलमगीर की हत्या के ठीक आठ माह शनिवार रात अचानक एक छात्र से मारपीट की घटना ने इतना तूल पकड़ लिया कि छात्र गुटों पर एएमयू इंतजामिया और पुलिस बल अंकुश नहीं लगा पाया। पुलिस के सामने ही दो पूर्व छात्रों को गोली मार दी गई और मौके पर ही वह गिर पड़े। हालांकि उस समय पुलिस बल कम था और छात्र इस कदर हावी थे कि इन पर काबू पाना नामुमकिन था।
एएमयू के इससे पुराने इतिहास पर गौर करें तो अब तक यहां कई छात्र व पूर्व छात्रों की हत्याएं हुई हैं। सीबीआई स्तर से जांच तक हुई हैं। हर बार के इस तरह के बड़े बवाल में अवैध असलहों से छात्र गुटों द्वारा इसी तरह फायरिंग की जाती रही हैं। एएमयू मारे गए या मौजूदा कई बड़े अपराधियों की शरणस्थली या कर्म स्थली भी रहा है। ताजा मामला एनआईए अफसर तंजील अहमद की हत्या का आरोपी मुनीर जैसे बड़े अपराधी का नाम एएमयू से ही जुड़ा है।