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कोविड अस्पताल में मां और बहन की आंखों के सामने हुई मौत

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डॉ अंकुर अग्रवाल - फोटो : Amar Ujala
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डॉक्टर्स डे... फोटो.... हेडिंग... कोविड अस्पताल में मां और बहन की आंखों के सामने हुई मौत सबहेड... ऐसे हालात में भी कोविड मरीजों की सेवा करते रहे डॉ. अंकुर कौशल कुमार ओझा अलीगढ़। दस दिन के अंतराल पर मां और बहन की मृत्यु के बाद अपने आप को संभाल कर रखना आसान नहीं है। वह भी तब जब दोनो की मृत्यु आंखों के सामने हुई हो। किसी भी इंसान को झकझोडऩे एवं तोडऩे के लिए यह हादसा काफी है। लेकिन डॉ. अंकुर अग्रवाल उसके बाद भी अपने कत्र्तव्य पथ पर डटे रहे। मरीजों में मां और बहन की छवि महसूस कर जान बचाने का प्रयास करते रहे। पं. दीनदयाल उपाध्याय संयुक्त चिकित्सालय (एल-२) में शुरूआती समय से ही डॉ. अंकुर अग्रवाल कार्य कर रहे हैं। शहर के जनकपुरी मोहल्ला में रहते हैं। अप्रैल महीने के अंतिम सप्ताह में उनकी मां कुसुम अग्रवाल (६९) कोरोना वायरस से संक्रमित हुई। तबियत ज्यादा खराब होने पर उन्हें उसी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जिसमें उनके पुत्र डॉ. अंकुर अग्रवाल ड्यूटी कर रहे थे। संयोग देखिए कि उस समय डॉ. अंकुर अग्रवाल भी आईसीयू में ड्यूटी कर रहे थे। डॉ. अंकुर अग्रवाल एवं उनके साथ काम कर रही पूरी टीम कुसुम अग्रवाल को बचाने का प्रयास करती रही। होनी को कुछ और मंजूर था। १ मई २०२१ को कुसुम अग्रवाल की मृत्यु डॉक्टर पुत्र के आंखों के सामने हो गई। डॉ. अंकुर अग्रवाल इस घटना से उबरते तब तक स्वर्ण जयंतीनगर निवासी बहन मनीष अग्रवाल कोरोना वायरस की चपेट में आ गई। बहन शहर के प्रतिष्ठित सेंट फिदेलिस सीनियर सेकेंडरी स्कूल में शिक्षिका थी। विधि को तो कुछ और ही मंजूर था। मनीषा अग्रवाल को भी डॉक्टर नहीं बचा पाए। १० मई को उनकी मृत्यु हो गई। दस दिन के अंतराल पर आंखो के सामने मां और बहन की मृत्यु से डॉ. अंकुर ही नहीं बल्कि उनके साथ काम कर रहे तमाम डॉक्टर एवं स्टाफ अंदर तक हिल गए। किसी के समझ में नहीं आ रहा था कि डॉ. अंकुर के पास जाकर कैसे सांत्वना दें। वक्त भी बेहद नाजुक था। अप्रैल और मई के महीने में कोरोना की दूसरी लहर खतरनाक रूप में सामने थी। डॉक्टर के समक्ष मृतक का शव एवं जिंदगी के लिए जूझते मरीज दोनो थे। डॉ. अंकुर अग्रवाल कहते हैं कि हमलोग जिंदगी बचाने का काम कर सकते हैं। जीवन और मृत्यु तो प्रभु के हाथ में है। उस समय अंतरमन ने यहीं कहा कि जितने लोगों को बचाने का प्रयास कर सकते हो, करों। यहीं मां एवं बहन के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। मरीजों का जीवन बचाने के लिए जो भी हो सकता था, किया। डॉ. अंकुर कहते हैं कि नजर के सामने मां और बहन को जाते हुए देखा। किसी भी मरीज की मौत होती है तो मन रोता है। जिस मरीज के बचने की उमीद नहीं होती और वह ठीक हो जाता है तो खुशी होती है। कोई डॉक्टर नहीं चाहता कि उसके सामने मरीज की मौत हो। पब्लिक को भी इस बात को समझना चाहिए और डॉक्टर का सपोर्ट करना चाहिए। ---
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