दीपक शर्मा
अलीगढ़। कबीर आप ठगाइये, और न ठगिये कोय, आप ठगै सुख, ऊपजै और ठगे दुख होय। जिस व्यक्ति के साथ ठगी की कोई घटना हो जाए तो अक्सर लोग कहते हैं उसने तुम्हें मूर्ख बना दिया। लेकिन इसके विपरीत कबीर स्वयं को ही ठगाए जाने के लिए पहल करने की बात कहते हैं। 1 अप्रैल को विधिवत मूर्ख दिवस के अवसर पर यह बात प्रासंगिक है कि आखिर मूर्खता में किस प्रकार का आकर्षण है।
ब्रिटिश लेखक चॉसर की किताब से शुरू हुआ सिलसिला
प्रसिद्ध गजल कार सुरेश कुमार कहते हैं कि मूर्ख दिवस के संबंध में यूरोपियन साहित्य में जिक्र मिलना शुरू होता है ब्रिटिश लेखक चॉसर की किताब द कैंटरबरी टेल्स में कैंटरबरी नाम के एक कस्बे का जिक्र किया गया है। इसमें इंग्लैंड के राजा रिचर्ड द्वितीय और बोहेमिया की रानी एनी की सगाई की तारीख 32 मार्च, 1381 को होने की घोषणा की गई थी, जिसे वहां के लोग सही मान बैठे और मूर्ख बन बैठे तभी से 1 अप्रैल को मूर्ख दिवस के रूप में मनाने की परंपरा का चलन शुरू हो गया। भारतीय साहित्य में भी स्वयं को ठगाने की परंपरा का जिक्र मिलता है।
बुद्धिमत्ता का महत्व इसीलिए है की मूर्खता का वजूद है स्पष्ट है कि मूर्खता के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता है कभी-कभी अकल का बोझ जीवन की खुशियों पर भारी पड़ जाता है इसलिए परिवर्तन के तौर पर मूर्खता संतुलन पैदा करती है
-सुरेश कुमार, प्रसिद्ध गजलकार
प्रसिद्ध कवि और व्यंग्यकार सुरेंद्र सुकुमार की मूर्ख दिवस पर ताजा रचना
मूर्ख दिवस पर मूर्ख ही होते हैं सरताज
जनता भी रखती सदा उनके सर पर ताज
उनके सर पर ताज वही होते हैं ज्ञानी
बाकी के सब लोग आज होते अज्ञानी
कहें सुरेन सुकुमार शर्म इस धूर्त दिवस पर
फिर भी खुशियां मना रहे हैं मूर्ख दिवस पर