न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष एजेंसी नासा की वैज्ञानिक और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की पूर्व छात्रा डॉ. हाश्मा हसन ने विश्वविद्यालय से नासा तक के सफर के अनुभव साझा किए हैं।
डॉ. हाश्मा ने कहा कि अंतरिक्ष विज्ञान में उनकी रुचि स्पुतनिक उपग्रह के लांच के समय पैदा हुई। एएमयू में परमाणु भौतिकी में स्नातकोत्तर करने के साथ ही उनके अंतरिक्ष वैज्ञानिक बनने का रास्ता प्रशस्त हुआ। नासा स्टेम स्टार्स के साथ एक साक्षात्कार में डॉ. हाश्मा ने कहा कि 1957 में स्पुतनिक लांच के समय वह बहुत छोटी थीं। लेकिन लखनऊ में रहते हुए खुले और साफ आसमान का अवलोकन करते हुए अंतरिक्ष में उनकी रुचि बढ़ती गई। समाचार पत्रों में मनुष्य की अंतरिक्ष यात्रा के बारे में पढ़ने में दिलचस्पी हुई।
वह कहती हैं, उन्हें वह दिन याद है, जब मनुष्य ने चांद पर पहली बार कदम रखा। डॉ. हाश्मा कहती हैं, नासा में काम करना बहुत ही चुनौतीपूर्ण है। अपने विद्यार्थी जीवन के संबंध में डॉ. हाश्मा ने कहा कि 1968 से 1973 तक एएमयू का छात्र जीवन बहुत यादगार है। उस समय की अकादमिक उपलब्धियों के फलस्वरूप उन्हें परमाणु भौतिकी में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में आगे की पढ़ाई करने के लिए छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई।
डॉ. हाश्मा हसन ने पोस्ट डॉक्टरेट के लिए टाटा इंस्टीट्यूट आफ फंडामेंटल रिसर्च मुंबई को ज्वाइन किया। यूएस काउंसिल फेलोशिप पर संयुक्त राज्य अमेरिका जाने से पहले भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र, मुंबई में भी काम किया। उन्होंने स्पेस टेलीस्कोप साइंस इंस्टीट्यूट बाल्टीमोर में काम किया। डॉ. हाश्मा ने बताया कि ऑप्टिकल टेलीस्कोप एसेंबली वैज्ञानिक के रूप में काम करते हुए उनकी प्राथमिक जिम्मेदारी थी कि दोष ठीक होने तक टेलीस्कोप को अच्छी स्थिति में रखा जाए। उन्होंने कहा कि नासा में काम करने का अवसर 1994 में आया, जब एक वरिष्ठ वैज्ञानिक पद के लिए विज्ञापन निकला।