प्रख्यात फिल्म स्टार नसीरुद्दीन शाह अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पहुंचकर पुरानी यादों में खो गए। कैनेडी हाल में आयोजित पूर्व छात्रों के सम्मेलन में छात्र-शिक्षकों से गुफ्तगू करते हुए उन्होंने कहा कि इसी मंच (कैनेडी हाल) से लड़खड़ाते हुए अपने फन की शुरुआत की थी। इसे व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं हैं। यहां तालीम एवं तरबियत हासिल की। अपनी कौम को पहचाना। उर्दू जबान सीखी।
शहनाज हाशमी, जाहिदा जैदी, मुनीबुर्रहमान और असद उर्रहमान के बगैर आज वहां नहीं पहुंचता, जहां आज हूं। अलीगढ़ का कर्ज जिंदगी भर नहीं उतार पाऊं गा। नसीरुद्दीन शाह ने कहा कि 1967 से 1970 तक यहां था। उस समय ड्रामा की एक्टिविटी बहुत होती थी। वे लोग कभी उर्दू कभी अंग्रेजी में ड्रामा पेश करते थे। आज ड्रामा की एक्टिविटी कम हो गई है। उन्होंने कुलपति जमीरूद्दीन शाह (अपने बड़े भाई) से आग्रह किया कि ड्रामा क्लब को फिर से जिंदा कराएं। फेसबुक पर मैसेज भेजने से काम नहीं चलेगा। थियेटर का मकसद इंसानों का इंसानों से बात करना है। ऐसा होता है तो वह वादा करते हैं कि यहां आकर स्वयं छात्रों को तरबिया देंगे। अलीग बिरादरी से मिली बेपनाह मोहब्बत एवं इज्जत से गदगद होकर नसीरूद्दीन शाह ने कहा कि उनके वालिद चाहते थे कि डॉ. बनूं। अम्मी सेहत एवं इज्जत बख्शने की दुआ करती थीं। आज अम्मी की दुआ लगता है कबूल हो गई है।