क्यों नहीं होती कार्रवाई
दरअसल, किसी भी सरकारी अस्पताल में बाहर की पर्ची पर न दवा मिल सकती है और ना कोई जांच हो सकती है। सरकारी डॉक्टर की सलाह पर यह मुमकिन है। अक्सर प्राइवेट डॉक्टर सामान्य वायरल में भी लिपिड प्रोफाइल सहित कई तरह की रक्त जांच लिखते हैं, जबकि सीबीसी जांच से ही काम चलाया जा सकता है।
वीआईपी मरीजों के इस खेल में सरकारी डॉक्टर पर कार्रवाई इसलिए नहीं होती क्योंकि वे सरकारी पर्ची पर ही लिखते हैं। दूसरा कार्रवाई करने वाले अफसर ही फोन करके इसे बढ़ावा दे रहे हैं। इसकी अहम जिम्मेदारी अस्पताल प्रबंधन की है, उन्हें अपने डॉक्टरों को स्पष्ट निर्देश देने चाहिए कि पर्ची पर वीआईपी मरीज के हिसाब से नहीं बल्कि सरकारी डॉक्टर के हिसाब से जांच लिखनी अनिवार्य है।
प्रयोगशाला पर दबाव, स्टाफ पहले से नहीं
डीडीयू की प्रयोगशाला में आठ तकनीशियन के पद हैं, जिनमें से सात पद खाली हैं। फिलहाल यहां एक सरकारी और एक अस्थायी तकनीशियन तैनात है जो हर दिन 400 से अधिक रक्त और यूरिन जांच कर रहे हैं। इसमें एलएफटी, केएफटी, सीबीसी, कोलेस्ट्रॉल प्रोफाइल, कैल्शियम, मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, टाइफाइड, मधुमेह, एचआईवी, हेपेटाइटिस सहित करीब 72 तरह की रक्त जांच शामिल हैं। ये सभी जांच प्राइवेट प्रयोगशाला में काफी महंगी होती हैं। कम से कम चार से पांच हजार रुपये का खर्च आता है जबकि डीडीयू अस्पताल में ये जांच महज एक रुपये की पर्ची के जरिये हो जाती हैं।
नियम क्या है?
सरकारी अस्पताल आने के बाद डॉक्टर पहले मरीज के लक्षण और केस हिस्ट्री को समझता है। फिर वह तय करता है कि उक्त मरीज का इलाज आगे कैसे किया जाए? कौन सी जांच और कौन सी दवाएं देनी चाहिए? यह सामान्य चिकित्सा प्रोटोकॉल है। नई दिल्ली स्थित भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने साल 2021 से 2025 के बीच 55 तरह की चिकित्सा विशेषताओं के लिए ऐसे प्रोटोकॉल राष्ट्रीय स्तर पर लागू किए हैं जिनका पालन प्रत्येक जिले में होना अनिवार्य है।