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अलीगढ़ः कर्ज लेकर पेट पाल रहे...पौष्टिक भोजन कहां से लाएं, कोरोना काल में बच्चों की हालत बेहद खराब

कौशल कुमार ओझा, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: पूजा त्रिपाठी Updated Tue, 29 Dec 2020 05:38 PM IST
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दीप्ती और प्रीती - फोटो : अमर उजाला

अलीगढ़ के क्वार्सी थाना क्षेत्र के श्रीनगर कॉलोनी गली नंबर 2 की 5 साल की पुष्पा 3 दिसंबर 2020 को दुनिया छोड़ कर चली गई। उसकी पहचान कुपोषित बच्ची के रूप में हुई थी। पुष्पा की 13 वर्षीय बड़ी बहन प्रीति का वजन 25 किलो 300 ग्राम है। वह मधुमेह से पीड़ित है। इनके पालक का कहना है कि कोरोना काल में हम कर्ज लेकर पेट पाल रहे हैं, पौष्टिक भोजन कहां से लाएं। 

अलीगढ़ नगर निगम के वार्ड नंबर 42 स्थित श्रीनगर कॉलोनी में प्रीति ही नहीं बल्कि पूजा, रेखा, दीप्ति, सेवकी और करन सहित कई बच्चों का वजन एवं लंबाई उम्र के हिसाब से बेहद कम है। महामारी एवं लॉकडाउन काल में पौष्टिक आहार न मिलने से ऐसे बच्चों की हालत पहले से ज्यादा खराब हुई है। घरों में बनने वाले भोजन पर नजर डालें तो दिल बैठ जाता है।



दूध, दही, पनीर, घी, मांस, मछली, अंडे, दाल, राजमा, सोयाबीन, ड्राई फ्रूट्स और फल आदि तो इनकी थाली में हैं ही नहीं। ज्यादातर बच्चे एवं उनके परिजन सब्जी-रोटी खाकर भूख मिटाते हैं। गौर करने की बात यह भी है कि इनमें से अधिकतर परिवार को अप्रैल से नवंबर 2020 के बीच निर्धारित मात्रा में निशुल्क राशन मिला।

कई महिलाओं के खाते में तीन महीने तक 500-500 रुपये आए, लेकिन सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई सहायता पर्याप्त नहीं है। बदहाली का एक प्रमुख कारण महामारी एवं लॉकडाउन के दौरान रोजगार न मिलना भी है। कुछ लोग तो ब्याज पर कर्ज लेकर बच्चों का पेट भर रहे हैं।

पात्र होने के बावजूद कई लोगों के पास अंत्योदय एवं आयुष्मान कार्ड नहीं है। पुष्पा के पिता अमर सिंह कहते हैं, 3 दिसंबर को बेटी की मौत हो गई। दूसरी बेटी मधुमेह की रोगी है। पैर से लाचार हूं। पत्नी कोठी में काम कर घर चला रही है। कई बार भूखे सोना पड़ता है। अन्य बच्चे भी कमजोर हैं। प्रीति कहती हैं, शुगर की बीमारी है। इंजेक्शन लगवाना पड़ता है। भरपेट खाना नहीं है। रोटी-सब्जी खाती हूं। फल, दूध घर में नहीं है।

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दीप्ती और प्रीती - फोटो : अमर उजाला
अलीगढ़ के क्वार्सी थाना क्षेत्र के श्रीनगर कॉलोनी गली नंबर 2 की 5 साल की पुष्पा 3 दिसंबर 2020 को दुनिया छोड़ कर चली गई। उसकी पहचान कुपोषित बच्ची के रूप में हुई थी। पुष्पा की 13 वर्षीय बड़ी बहन प्रीति का वजन 25 किलो 300 ग्राम है। वह मधुमेह से पीड़ित है। इनके पालक का कहना है कि कोरोना काल में हम कर्ज लेकर पेट पाल रहे हैं, पौष्टिक भोजन कहां से लाएं। 

अलीगढ़ नगर निगम के वार्ड नंबर 42 स्थित श्रीनगर कॉलोनी में प्रीति ही नहीं बल्कि पूजा, रेखा, दीप्ति, सेवकी और करन सहित कई बच्चों का वजन एवं लंबाई उम्र के हिसाब से बेहद कम है। महामारी एवं लॉकडाउन काल में पौष्टिक आहार न मिलने से ऐसे बच्चों की हालत पहले से ज्यादा खराब हुई है। घरों में बनने वाले भोजन पर नजर डालें तो दिल बैठ जाता है।

दूध, दही, पनीर, घी, मांस, मछली, अंडे, दाल, राजमा, सोयाबीन, ड्राई फ्रूट्स और फल आदि तो इनकी थाली में हैं ही नहीं। ज्यादातर बच्चे एवं उनके परिजन सब्जी-रोटी खाकर भूख मिटाते हैं। गौर करने की बात यह भी है कि इनमें से अधिकतर परिवार को अप्रैल से नवंबर 2020 के बीच निर्धारित मात्रा में निशुल्क राशन मिला।

कई महिलाओं के खाते में तीन महीने तक 500-500 रुपये आए, लेकिन सरकार द्वारा उपलब्ध कराई गई सहायता पर्याप्त नहीं है। बदहाली का एक प्रमुख कारण महामारी एवं लॉकडाउन के दौरान रोजगार न मिलना भी है। कुछ लोग तो ब्याज पर कर्ज लेकर बच्चों का पेट भर रहे हैं।

पात्र होने के बावजूद कई लोगों के पास अंत्योदय एवं आयुष्मान कार्ड नहीं है। पुष्पा के पिता अमर सिंह कहते हैं, 3 दिसंबर को बेटी की मौत हो गई। दूसरी बेटी मधुमेह की रोगी है। पैर से लाचार हूं। पत्नी कोठी में काम कर घर चला रही है। कई बार भूखे सोना पड़ता है। अन्य बच्चे भी कमजोर हैं। प्रीति कहती हैं, शुगर की बीमारी है। इंजेक्शन लगवाना पड़ता है। भरपेट खाना नहीं है। रोटी-सब्जी खाती हूं। फल, दूध घर में नहीं है।

16 वर्ष की दीप्ति, वजन 31.4 किलो

भूरी देवी (42 वर्ष) के परिवार के सदस्यों की सेहत शोध का विषय हो सकता है। 42 वर्ष की भूरी देवी का वजन 41 किग्रा है। 50 वर्षीय पति का वजन 44 किग्रा है। भूरी देवी के 5 बच्चों में से दो असामान्य है। दो बेटियों का ठीक से मानसिक विकास नहीं हुआ है, जिसमें से एक की शादी हो चुकी है। अविवाहित 16 वर्षीय बेटी दीप्ति का वजन 31.4 किग्रा. है। परिवार के अन्य सदस्यों का वजन एवं लंबाई उम्र के हिसाब से कम है।

महिला अस्पताल के एसएनसीयू में 11 महीने 16 दिन में 231 नवजात की मौत

अलीगढ़ के मोहनलाल गौतम महिला चिकित्सालय स्थित एसएनसीयू में 11 महीने 16 दिन में 231 नवजात की मौत हो गई। महामारी के कारण उपजे हालात भी इसके लिए जिमेदार हैं। लॉकडाउन के दौरान स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गई थी। प्राइवेट अस्पतालों में भर्ती बंद थी।

महिला अस्पताल में स्वास्थ्य सेवाएं बहाल थी और प्रसव हो रहे थे। महिला अस्पताल स्थित एसएनसीयू में 14 बेड हैं, जिसमें से 7 इंडोर एवं 7 आउटडोर पेसेंट के लिए है। जनवरी से लेकर 16 दिसंबर 2020 तक एसएनसीयू में करीब 1658 नवजात भर्ती हुए। इसमें से 231 की मृत्यु हो गई।

अस्पताल की सीएमएस डॉ. रेनू शर्मा का कहना है कि कोरोना काल में महिला अस्पताल बंद नहीं हुआ। अप्रैल 2020 से अब तक करीब 8 हजार बच्चों का यहां जन्म हुआ है। डॉ. रेनू ने बताया कि एसएनसीयू में बेहद गंभीर नवजात आते हैं। हमलोग उन्हें बचाने की पूरी कोशिश करते हैं। कुछ को नहीं बचा पाते हैं।

जेएन मेडिकल कॉलेज के एसएनसीयू में 159 की मौत

अलीगढ़ के जेएन मेडिकल कॉलेज के एसएनसीयू में जून से नवंबर 2020 के बीच 159 नवजात की मौत हुई है। जून में 27, जुलाई में 22, अगस्त में 28, सितंबर में 28, अक्तूबर में 32 एवं नवंबर में 22 नवजात की मौत हुई। एसीएमओ डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि पिछले 6 माह में 609 नवजात जेएन मेडिकल कॉलेज के एसएनसीयू में भर्ती हुए।

आंकड़े एक नजर में
जनपद में आंगनबाड़ी केंद्रों पर पंजीकृत 0 से 5 साल के बच्चे - 358677

अति कुपोषित- 7042
कुपोषित- 20174

बच्चों के अतिकुपोषित एवं कुपोषित (सैम-मैम) होने के नियम बदल गए हैं। बच्चों को पहले पोषाहार के रूप में नमकीन व मीठी दलिया, पंजीरी आदि मिल रहा था। अब बंद हो गया है। उसके स्थान पर ड्राई राशन के रूप में गेहूं, चावल, दाल दिया जा रहा है या दिया जाएगा।- श्रेयस कुमार, डीपीओ

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