वैद्य नगरी की फिजा में इन दिनों अकबरी मिठाई की खुशबू फैली हुई है। रक्षाबंधन के बाद सिर्फ दो माह के दौरान बनने वाली इस अकबरी मिठाई के दीवाने कस्बा के लोग ही नहीं बल्कि प्रदेश के कई शहरों में रहने वाले लोग सौगात के रूप में ले जाते हैं। कस्बे में मिठाई का कारोबार लाखों का हो जाता है।
विजयगढ़ में करीब 130 साल से यहां के हलवाई अकबरी मिठाई को बनाते चले आ रहे हैं। यह मिठाई और कहीं नहीं बनती। इसकी शुरुआत कस्बा के हलवाई लाला पन्नालाल अग्रवाल, शंकरलाल अग्रवाल, जयंती प्रसाद वार्ष्णेय, किशन लाल वार्ष्णेय, हरिशंकर वार्ष्णेय, चंदीलाल अग्रवाल, रघुनाथ प्रसाद वार्ष्णेय, प्रेमचंद वार्ष्णेय आदि के प्रतिष्ठानों पर बनना शुरू हुई थी, यह लोग अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन आज भी अकबरी मिठाई उनके पुत्र, नाती, परनाती लगातार बना रहे हैं।
भुरभुरी और जायकेदार
अकबरी मिठाई की खासियत के बारे में हलवाई पिंकी लाला, रवि वार्ष्णेय ने बताया बेहद साफ-सफाई के साथ चावल, घी, चीनी आदि से इसे बनाया जाता है। पहले चावल को पीसकर घी के साथ भूना जाता है और बाद में चीनी की चाशनी चढ़ाकर उसे तैयार किया जाता है। खाने में भुरभुरी और जायकेदार होती है। इस मिठाई की खासियत है कि यह 20-25 दिन घर में रखकर इसको खा सकते हैं यह खराब नहीं होती।
दो माह में होता है लाखों का कारोबार
प्रत्येक दुकान पर हर दूसरे-तीसरे दिन यह मिठाई बनाई जाती है। एक दिन में विजयगढ़ से 50-60 किलो करीब यह मिठाई बिक जाती है। इस मिठाई का ढाई महीने में सभी दुकानदारों की बिक्री करीब 10 से 15 लाख रुपये की हो जाती है। आसपास के लोग, रिश्तेदार अकबरी को सौगात के रूप में ले जाते हैं। 75 वर्षीय ज्ञानचंद वार्ष्णेय ने बताया उनके बाबा लीलाधर वार्ष्णेय ने करीब 130 वर्ष पहले अकबरी मिठाई बनाई थी। जब से प्रचलन है। इस मौसम में केवल दो महीने के लिए यह मिठाई बनाई जाती है।
अकबरी मिठाई की खासियत
- 130 साल से साल में बन रही है अनोखी मिठाई
- 250 रुपये किलो रुपये में बिकती है
- 15 लाख रुपये करीब का दो माह में है कारोबार
- 60 किलो तक रोजाना हो जाती है इसकी बिक्री
- 2 माह तक बनाई जाती है रक्षाबंधन के बाद