करोड़ों बहाए, फिर भी 50 फीसदी मतदान नहीं
ब्यूरो, अमर उजाला अलीगढ़।
तमाम माध्यमों से मतदाता जागरूकता के नाम पर करोड़ों खर्च कर चुनाव जैसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ज्यादा से ज्यादा मतदान कराने के प्रयास नाकामयाब नजर आ रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में व्हाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर, ब्लाग आदि के माध्यम से मतदाताओं को प्रेरित करने का चलन बढ़ने के बजाय मतदाता का मिजाज बदलने के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति उदासीन ही हुआ है। कम से कम नगर निगम में मेयर एवं पार्षद पद के लिए अपनाई जाने वाली नितांत लोकतांत्रिक प्रक्रिया के आंकड़े तो कमोबेश यही कहानी बयां कर रहे हैं।
पिछले 17 वर्षों में वोटराें की संख्या में तो 1 लाख 96 हजार 277 का इजाफा हुआ है, लेकिन वोटिंग प्रतिशत उठने के बजाय गिरा ही है। हालांकि इस बार निकाय चुनाव में वर्ष 2012 के मुकाबले वोटिंग प्रतिशत छह फीसदी बढ़ा है, लेकिन वर्ष 2000 से अब तक के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो यह बढ़ोत्तरी उत्साहजनक नजर नहीं आती। वर्ष 2000 के मेयर एवं पार्षद पद के चुनाव में कुल 4 लाख 15 हजार 960 मतदाताओं में से 2 लाख 37 हजार 480 वोटरों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। यह कुल वोटरों का 57.09 फीसदी बैठता है। वर्ष 2006 में 4 लाख 82 हजार 584 में से 2 लाख 48 हजार 755 मतदाताओं ने मताधिकार का प्रयोग किया। जो कुल वोटरों का 51.54 फीसदी बैठता है। वर्ष 2012 में कुल 5 लाख 46 हजार 938 वोटरों में से 2 लाख 29 हजार 956 वोटरों ने मतदान किया। जो कुल वोटरों का 43 फीसदी बैठता है। वर्ष 2017 में पिछले वर्ष की तुलना में करीब 65299 वोटर बढ़ गए और 6 लाख 12 हजार 237 मतदाताओं में से मात्र 3 लाख 02 हजार 946 वोटरों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। जो कुल मतदाताओं का करीब 49.5 फीसदी बैठता है।
वर्षवार वोटिंग प्रतिशत
-वर्ष 2000-57.09
-वर्ष 2006-वोटर बढ़े 66 हजार 624-वोटिंग-51.54 प्रतिशत
-वर्ष 2012-वोटर बढ़े 64 हजार 354-वोटिंग-43.00 प्रतिशत
-वर्ष 2017-वोटर बढ़े 65 हजार 299-वोटिंग-49.5 प्रतिशत
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कहीं ज्वलंत मुद्दों के बरकरार रहना तो नहीं है वजह
अलीगढ़। जानकारों का मानना है कि तमाम प्रयासों के बावजूद जनता के वोटिंग के प्रति रुझान में कमी का मुख्य कारण जनता की अपेक्षाओं का पूरा न होना भी है। पिछले करीब डेढ़ दशक में आम धारणा रही है कि महापौर अथवा पार्षद उनके दैनिक जीवन की जन सुविधाओं और मूलभूत समस्याओं के लिए निर्णायक फैसले नहीं ले सकता। नियमानुसार उसे किसी भी बड़े प्रोजेक्ट के लिए शासन से अलग से बजट नहीं मिलता। ऐसे में उसे चुनने से क्या फायदा। जलभराव हो, पेयजल, सफाई एवं असमय कूड़ा उठान की समस्या निरंतर बरकरार होना भी वोटरों की उदासीनता की प्रमुख वजह मानी जा रही है।