लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद जिले के गांव गुरसिकरन की 628.50 एकड़ भूमि पशुधन विभाग के स्वामित्व में आ गई है। हाल ही में गांव गुरसिकरन, दारापुर एवं महुआखेड़ा की इस भूमि के मामले में प्रमुख सचिव पशुधन की अध्यक्षता में हुई बैठक में उक्त भूमि पर पशुधन विभाग का स्वामित्व स्वीकार किया गया और इसे विभाग के सुपुर्द किए जाने का निर्णय लिया गया। आदेश में यह भी कहा गया है कि पौधों के 0.4 घनत्व वाली भूमि को यथावत रखा जाए और विशेष परिस्थितियों में पशुपालन विभाग उक्त भूमि के उपयोग के मामले में निर्णय ले।
वर्ष 1996 में टीआर गोडावर्मन थीरुमल्कपाद बनाम भारत सरकार व अन्य मामले में न्यायालय में दायर मुकदमे में वर्ष 2012 में उक्त भूमि को पशुपालन विभाग की मानते हुए उसकी सुपुर्दगी देने के आदेश दिए गए थे। पशुपालन विभाग कोई कार्रवाई कर पाता, इससे पहले हरदुआगंज क्षेत्र के एक अधिवक्ता ने शासन-प्रशासन पर हरे पेड़ों का कटान करने का आरोप लगाते हुए राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण में केस फाइल कर दिया। गुरसिकरन गांव की भूमि मामले में कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता में अब तक छह बैठकें हुईं।
आखिरी बैठक 22 नवंबर 2021 को हुई थी। इसमें उक्त भूमि को वन प्रक्षेत्र की न मानते हुए इसे पशुपालन विभाग की भूमि ठहराया गया। इसमें कहा गया कि उक्त भूमि निर्विवाद रूप से उत्तर प्रदेश पशुधन उद्योग निगम लिमिटेड की है। क्षेत्र में उगे पड़ों का घनत्व 0.4 है। अत: यह वन क्षेत्र है। इस क्षेत्र के पेड़ों का चिन्हीकरण कराकर यहां ग्रीन बेल्ट स्थापित की जाए। न्यायालय ने यह भी जोड़ा कि भूमि क्रेता द्वारा यदि ग्रीन बेल्ट निर्मित भूमि की आवश्यकता अनुभव की जाती है तो उसके लिए वह स्वयं वन संरक्षण अधिनियम 1980 के तहत सक्षम स्तर से अनुमति प्रदान करने के लिए सक्षम होंगे। न्यायालय ने कहा कि उत्तर प्रदेश पशुधन उद्योग लिमिटेड सीडीएफ स्वत: उगे पेड़ों के क्षेत्र को छोड़कर अन्य भूमि पर नियमानुसार कार्रवाई कर सकता है।
जिले को मिल सकती है स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी
अलीगढ़। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय एवं राजा महेंद्र प्रताप राज्य विश्वविद्यालय के बाद जिले को एक और यूनिवर्सिटी की सौगात मिल सकती है। हालांकि, यह सब शासन के निर्देशों पर निर्भर है। बताते चलें कि वर्ष 2014 में तत्कालीन सपा सरकार ने उक्त भूमि के 200 एकड़ हिस्से में अत्याधुनिक स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी बनाने की घोषणा की थी। साथ ही, 200 मीटर हिस्से को अलीगढ़ विकास प्राधिकरण को आवासीय योजना के लिए देने, 150 एकड़ भूमि यूपीएसआईडीसी को देने तथा शेष बची 50 एकड़ भूमि रैपिड एक्शन फोर्स मुख्यालय को देने का प्रस्ताव पारित हुआ था, लेकिन ऐन मौके पर एनजीटी के यथा स्थिति कायम रखते हुए मामले की सुनवाई प्रमुख सचिव पशुधन की अध्यक्षता वाली समिति से कराने संबंधी आदेश के कारण मामला अटक गया था।
वर्ष 2015 में दाखिल की गई थी रिव्यू पिटीशन
अलीगढ़। स्पोर्ट्स यूनिवर्सिटी समेत अन्य योजनाओं के क्रियान्वयन पर रोक के बाद वर्ष 2015 में अर्जुन सिंह भोलू की अगुवाई में सुरेंद्र चौहान, सत्येंद्र सिंह, राजू चौहान समेत जिले के 22 प्रधानों ने एनजीटी में रिव्यू पिटीशन दाखिल की। इसमें गुरसिकरन गांव की भूमि का सरकारी योजनाओं में प्रयोग पर सहमति जताई गई। कहा गया कि इससे आसपास के हजारों लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर सामने आएंगे।
शुरू से पशुधन विभाग का रहा है गुरसिकरन प्रक्षेत्र
अलीगढ़। गुरसिकरन क्षेत्र हमेशा से ही पशुधन विभाग के प्रक्षेत्र में रहा है। यहां वर्ष 1996 तक सेंट्रल डेयरी फार्म का संचालन होता था। इस फार्म के खत्म होने के बाद से यह भूमि बेकार पड़ी थी। भूमाफिया द्वारा इस भूमि पर कब्जे की कोशिश के बाद वन विभाग ने भी इस जमीन पर दावेदारी जतानी शुरू कर दी। तब से यह मामला लगातार न्यायालय में चल रहा है।
वर्जन
- गांव गुरसिकरन की भूमि के मामले में 22 प्रधानों ने एनजीटी में रिव्यू पिटीशन दाखिल की थी। तर्क यह था कि उक्त भूमि सरकार को दे दी जाए ताकि यहां का विकास हो और क्षेत्रीय लोगों को रोजगार मिले। एनजीटी ने हमें शासन के पास भेजा। लगातार छह साल के संघर्ष के बाद इस भूमि को जंगल न मानते हुए कृषि उत्पादन आयुक्त की अध्यक्षता वाली समिति ने इसे पशुधन विभाग की भूमि माना है। इस निर्णय से गुरसिकरन व आसपास के क्षेत्र का विकास होगा।
अर्जुन सिंह भोलू, अध्यक्ष, गुरसिकरन क्षेत्र विकास संघर्ष समिति
वर्जन
- गांव गुरसिकरन क्षेत्र की 628.50 एकड़ भूमि के मामले में पशुधन विभाग के पक्ष में निर्णय आया है। शासन अब इस भूमि के उपयोग के मामले में निर्णय करेगा।
- डॉ. चंद्रवीर सिंह, मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी
अर्जुन सिंह भोलू- फोटो : CITY OFFICE