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Locust: एएमयू के शोध में हुआ खुलासा, दिल्ली-एनसीआर में टिड्डों की 54 प्रजातियां, सात नई खोजी गईं

Mon, 11 May 2026 02:09 PM IST
Chaman Kumar Sharma इकराम वारिस, अमर उजाला, अलीगढ़

सार

टिड्डे झुंड में एक दिन में 150 किलोमीटर तक उड़कर फसलों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। ये अपने पैरों का इस्तेमाल शोर मचाने के साथ-साथ कूदने के लिए भी करते हैं। ये आमतौर पर अपने आसपास के पौधों और फसलों को खाते हैं।
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टिड्डा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में टिड्डों की कुल 54 प्रजातियां हैं, इनमें सात नई प्रजातियां सामने आई हैं। यह खुलासा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) के जंतु विज्ञान विभाग के शोध में हुआ है। बुलंदशहर जिले में सबसे अधिक और रोहतक में सबसे कम जैव विविधता पाई गई है।

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जंतु वैज्ञानिक प्रो. मोहम्मद कामिल उस्मानी के निर्देशन में प्रीति ने टिड्डों (शॉर्ट-हॉर्न्ड ग्रासहॉपर) पर शोध किया। उन्होंने दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में पाए जाने वाले टिड्डों की 54 प्रजातियों का रिकॉर्ड तैयार किया है। यह शोध वर्ष 2019 से 2024 के बीच दिल्ली-एनसीआर के 25 जिलों में किया गया। जिसमें हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के कृषि एवं गैर-कृषि क्षेत्रों से कुल 1925 ग्रासहॉपर के नमूने एकत्र किए गए।

इनमें सबसे अधिक संख्या ऑक्सीने उपकुल की रही, जबकि ऑडीपोडीने और आर्कीडेन उपकुल की भी बड़ी संख्या दर्ज की गई। आर्थोपटेरा कुल के तहत आने वाले ये कीट विश्वभर में पाए जाते हैं और कृषि व्यवस्था पर गहरा प्रभाव डालते हैं। सामान्य परिस्थितियों में घास और फसलों पर निर्भर रहने वाले ये कीट पर्यावरणीय बदलाव की स्थिति में विशाल झुंड बना लेते हैं, जिससे भारी नुकसान और खाद्य संकट उत्पन्न हो सकता है।
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शोध में इन टिड्डों की पहचान उनके आकार, सिर, पंख, प्रोनोटम, टांगों और नर-मादा जननांगों की सूक्ष्म संरचनाओं के आधार पर की गई। इसमें कुल 12 उपकुल, 29 वंश और 54 प्रजातियों का विवरण दर्ज किया गया। सात नई प्रजातियों की खोज की गई। शोध के दौरान यह भी पाया गया कि ऑडीपोडीने उपकुल के बैंड-विंग्ड ग्रासहॉपर दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में सबसे अधिक विविधता वाले समूह हैं। वहीं ऑक्सीने उपकुल के राइस ग्रासहॉपर धान के खेतों और जल स्रोतों के आसपास बड़ी संख्या में पाए गए।

प्रो. मोहम्मद कामिल उस्मानी के अनुसार, यह अध्ययन दिल्ली एनसीआर क्षेत्र की जैव विविधता, कीट वर्गिकी और कृषि कीट प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान करेगा। साथ ही भविष्य में टिड्डों के प्रकोप को समझने और नियंत्रित करने में भी यह शोध उपयोगी साबित हो सकता है।

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ये हैं सात नई प्रजातियां
इस शोध में चार नई प्रजातियों की खोज की गई है। जिसमें ऑक्सिया सेमीसेर्का, एक्रिडा गिंगेटिया लाॅन्गस, आर्थोकटा, जेला स्टोरहिनस, शैनन वेनर, सिम्पसन और मार्गलेफ प्रजातियां शामिल हैं।

एक दिन में 150 किमी की उड़ान
टिड्डे झुंड में एक दिन में 150 किलोमीटर तक उड़कर फसलों को भारी नुकसान पहुंचाते हैं। ये अपने पैरों का इस्तेमाल शोर मचाने के साथ-साथ कूदने के लिए भी करते हैं। ये आमतौर पर अपने आसपास के पौधों और फसलों को खाते हैं। इनसे अपनी जरूरत का सारा पानी और पोषण प्राप्त कर लेते हैं। टिड्डा ऑर्थोपटेरा गण का एक शाकाहारी कीट है। ये आमतौर पर हरे या भूरे रंग के होते हैं, जो इन्हें घास-फूस में छिपने में मदद करते हैं।

इन जिलों में हुआ शोध
बुलंदशहर, अलवर, भरतपुर, हापुड़, मेरठ, बागपत, पानीपत, सोनीपत, नई दिल्ली, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, नूंह, फरीदाबाद, गुरुग्राम, रोहतक, मुजफ्फरनगर, करनाल, शामली, रेवाड़ी, जिंद, चंदारी दादरी, भिवाड़ी और महेंद्रगढ़।

दुनिया भर में 8,000 प्रजातियां
कीट वर्ग के सबसे बड़े गणों में शामिल ऑर्थोपटेरा विश्वभर में व्यापक रूप से पाया जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत में इसकी 1274 प्रजातियां, 442 टैक्सा और 23 कुल पाए जाते हैं। विश्वभर में लगभग 8,000 प्रजातियों वाला यह एक महत्वपूर्ण समूह है। इनमें से 136 प्रजातियां और 28 वंश स्थानिक (एंडेमिक) माने जाते हैं।
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