न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के आदेश पर आरटीओ कार्यालय में आने वाले कॉमर्शियल वाहनों में गति नियंत्रण उपकरण (एसएलडी/स्पीड गवर्नर) लगाने का काम जोरों पर है। बिना एसएलडी के कॉमर्शियल वाहनों को फिटनेस सर्टिफिकेट नहीं मिल रहा है। आधी अधूरी तैयारी के साथ वाहनों में एसएलडी के नाम पर आरटीओ में अवैध वसूली जोरों पर है।
1500 से 2500 रुपये कीमत वाले उपकरण के खुलेआम पर पांच से छह हजार रुपये वसूले जा रहे हैं। पांच से छह हजार रुपये उन वाहन स्वामियों से लिए जा रहे हैं जिनके वाहनों में ये उपकरण नहीं लगा है। आरटीओ विभाग ने महानगर में चार कंपनियों को वाहनों में स्पीड गवर्नर लगाने की अनुमति दी है। जबकि कई ऐसे हैं जो कि बिना अनुमति के ही उपकरण को कॉमर्शियल वाहनों में लगा रहे हैं।
लगातार बढ़ रहे सड़क हादसों को मद्दे नजर रखते हुए केंद्र सरकार ने सभी कॉमर्शियल वाहनों में एसएलडी/स्पीड गवर्नर लगाने के आदेश दिए हैं। हालांकि यह आदेश तो बहुत पुराना है और कई प्रदेशों में स्पीड गवर्नर लगे वाहनों का संचालन हो रहा है, लेकिन उत्तर प्रदेश में अब इसका पालन होना शुरू हुआ है।
प्रदेश सरकार के कड़े रुख के चलते आरटीओ अलीगढ़ में भी कॉमर्शियल वाहनों में एक सप्ताह पूर्व से ही स्पीड गवर्नर लगाने का काम शुरु हो गया। वाहनों को फिटनेस सर्टिफिकेट देने वाले संभागीय निरीक्षक बिना स्पीड गवर्नर के प्रमाण पत्र जारी नहीं कर रहे हैं।
इसी की नतीजा है कि कार्यालय परिसर में स्पीड गवर्नर की बिक्री करने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। 1500 से 2500 रुपये वाला स्पीड गवर्नर खुलेआम पांच से छह हजार रुपये में बेचा जा रहा है। जिसमें आरटीओ के कुछ कर्मी और दलालों का कमीशन भी सेट है।
रहस्य बन गए हैं चार कंपनियों के नाम
संभागीय परिवहन अधिकारी कार्यालय ने वर्तमान में चार लोगों को गति नियंत्रण उपकरण लगाने का अनुमित दी है, लेकिन यह चार कंपनी कौन सी है। इसका खुलासा न तो आरटीओ कर रहे हैं और न ही उनके अधीनस्थ। बकौल आरटीओ राधेश्याम पूरे प्रदेश में 77 कंपनियों को गति नियंत्रण यंत्र लगाने की अनुमति है। अलीगढ़ में एआरटीओ (प्रशासन) की देखरेख में उपकरण लगाने वालों को अनुमति दी जा रही है। वर्तमान में चार कंपनियों को उपकरण लगाने की अनुमति है। इसकी लिस्ट एआरटीओ प्रशासन के पास है। उन्हें इसकी जानकारी नहीं है कि किस कंपनी को स्पीड गवर्नर लगाने की अनुमति प्रदान की गई है।
ये हैं स्पीड गवर्नर के लिए नियम
-उत्पादक को रखना पड़ेगा स्पीड गवर्नर का रिकॉर्ड
-स्पीड गवर्नर उत्पादक को डाटा सेंटर बनाना होगा।
-यहां हर स्पीड गवर्नर का डाटा सेव करना पड़ेगा।
-गाड़ी नंबर, स्पीड गवर्नर का मोडल नंबर भी सेव करना होगा।
-वाहन में स्पीड गवर्नर लगाने के बाद रोटो सील से सील करना होगा। अगर इससे छेड़छाड़ होती है तो स्पीड गवर्नर किसी काम का नहीं रहेगा।
-स्पीड गवर्नर के ऊपर उसकी टेस्ट रिपोर्ट, मॉडल नंबर व वाहन का नंबर लिखना पड़ेगा।
बिना मशीन के कैसे होगी जानकारी स्कैन?
फिटनेस के लिए आने वाले वाहन में लगे स्पीड गवर्नर की पूरी जानकारी परिवहन विभाग के कर्मचारी को स्कैन करनी होगी। मशीन से स्कैन होने के बाद जानकारी सर्वर में लोड करनी पड़ेगी। साथ ही उत्पादक व डीलर, वाहन क्रमांक, गवर्नर की टेस्ट रिपोर्ट व उसे वाहन में लगाने की तारीख भी सर्वर में लोड करनी होगी। जबकि अभी तक आरटीओ के अधिकारियों के पास मशीन तक नहीं है।
इन वाहनों में है आवश्यक
- डंपर, टैंकर, स्कूल बस समेत अन्य माल कॉमर्शियल वाहन
इनको मिली है छूट
दोपहिया, तिपहिया, विकलांगों के मॉडीफाई किए हुए दोपहिया वाहन, अग्निशमन, एंबुलेंस।
स्पीड गवर्नर के नाम पर अधिकारी कर रहे हैं मनमानी
सपा पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश सचिव राजेश सैनी ने कहा कि संभागीय परिवहन कार्यालय के अधिकारी मनमाने तरीके से स्पीड गवर्नर वाहनों में लगवा रहे हैं। शहर के अंदर चलने वाले वाहन इतनी स्पीड में दौड़ते ही नहीं कि उन्हें गति नियंत्रण उपकरण की आवश्यकता पड़े। शासन से आए आदेश में भी प्राइवेट बसों में गति नियंत्रण यंत्र लगाने का आदेश नहीं है। फिर भी अधिकारी जबरन बसों में वसूली के लिए यंत्र को लगा रहे हैं। जो यंत्र 1500 से 2500 रुपये का आता है उसे खुलेआम पांच से छह हजार रुपये में लगवाया जा रहा है। अधिकारियों की नाम के नीचे होने वाली वसूली स्पष्ट करती है कि यंत्र की बिक्री में इनका हिस्सा भी शामिल हैं।