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जलता है रावण तो बहते हैं दु:ख के आंसू

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जलता है रावण तो बहते हैं दुख के आंसू
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ब्यूरो, अमर उजाला, अलीगढ़।

वैसे तो रावण और उसके कुटुम्ब का पुतला फूंका जाना खुशी का विषय होता है। जैसे ही भगवान राम का बाण रावण के पुतले का दहन करता है, लोग उल्लास से नारे लगाते हैं। दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जो इस मौके पर इतने दुखी होते हैं कि उनके आंसू निकलने लगते हैं। यह हाल होता है रावण का पुतला तैयार करने वाले परिवार का।

खास तौर पर महिलाएं व बच्चे ज्यादा भावुक हो जाते हैं। पूरे एक माह तक दिन-रात मेहनत कर रावण, कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले तैयार करते हैं। वहीं दशहरा के दिन तीनों का दहन कुछ एक क्षणों में हो जाता है। यद्यपि उनको इसका दाम मिलता है पर अपनी कृति से लगाव होना स्वाभाविक है।
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बुलंदशहर के दानपुर निवासी अशफाक पिछले 50 वर्षोँ से रावण, कुंभकरण एवं मेघनाथ के पुतला का निर्माण करते चले आ रहे हैं। इसके पहले उनके उस्ताद और पिता गफूर पुतला निर्माण करते थे। छोटी सी उम्र में ही उन्होंने पुतला निर्माण की विरासत को अपने हाथों में ले लिया। इसके बाद वह लगातार पुतला बनाने के कार्य में लगे हुए हैं।

धीरे-धीरे उनका परिवार बड़ा हुआ तो वे लोग भी इस काम में लग गए हैं। वर्तमान में पूरे 10 लोगों का परिवार पुतला निर्माण के कार्य में लगा हुआ है। अशफाक ने बताया कि वह पहली बार अलीगढ़ में पुतलों का निर्माण कर रहे हैं। इससे पहले नागपुर, दिल्ली, बंबई, सूरत, अहमदाबाद, आगरा, मथुरा एवं कानपुर में पुतला बना चुके हैं।

उन्होंने कहा कि रावण का जब दहन होता है तो लोग खुशियां मनाते हैं, लेकिन वह और उनका परिवार आंसू बहाता है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में कार्य की कमान उनके भाई इदरीश ने संभाल रखी है। इस बार पुतला बनाने का ठेका एक लाख 60 हजार रुपये में मिला है। जबकि पिछले बार उन्होंने कानपुर में एक लाख 20 हजार रुपये में पुतला बनाया था। हालांकि पूर्व की अपेक्षा इस बार आतिशबाजी के साथ अन्य काम भी बढ़ाए गए हैं।

75 फीट की रावण की ऊंचाई

रावण की हंसी, हाथ में लगी ढाल और छत्र का घूमना, खोपड़ी से आग के अंगारे निकलने के साथ 75 फीट की उसकी ऊंचाई आकर्षण का केंद्र रहेगी। इदरीश ने बताया कि कुंभकरण और मेघनाथ के पुतले की ऊंचाई 55 फीट होती है। इस बार पुतले में अधिक आतिशबाजी है। यही कारण है कि काम अधिक बढ़ गया है।
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दशहरा के बाद शादियों में आतिशबाजी

दशहरा के पूर्व तो उन्हें रावण आदि का पुतला बनाने का कार्य मिल जाता है, लेकिन आम दिनों में रोजी-रोटी की समस्या खड़ी हो जाती है। इससे निपटने के लिए वह शादी विवाह में आतिशबाजी का काम करते हैं। इतनी मात्रा में विस्फोटक सामग्री साथ रखने के कारण हमेशा हादसे का डर बना रहता है। कई बार छोटे-मोटे हादसे होने के बाद उन्होंने विस्फोटक सामग्री को अलग-अलग रखना शुरू कर दिया है।
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