न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
जनपद की भूमि बंजर होने की कगार पर है। मिट्टी में लगातार घटती रहे जीवांश कार्बन दर के कारण वर्तमान में छह प्रतिशत भूमि ही .51 जीवांश दर के साथ खेती करने के लायक बची है। मंडलभर में 2018-19 में लिए मिट्टी के ढाई लाख नमूनों की जांच रिपोर्ट में यह बात सामने आई है। इसमें एक लाख के करीब नमूने अकेले अलीगढ़ जनपद से लिए गए थे। कृषि विभाग के अधिकारियों के माथे पर चिंता की लकीरें छा गई है। मृदा हेल्थ परीक्षण योजना का भी कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है।
कृषि विभाग मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ाने को लेकर लगातार सजगता दिखा रहा है। मगर, यह सब कागजी कार्रवाई साबित हो रही है। मिट्टी के जीवांश कार्बन की दर घटने के कारण जनपद की भूमि बंजर होने जा रही है। जीवांश कार्बन दर निकालने को लिए नमूनों के आधार पर आई रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में अनुमानित .31 प्रतिशत जीवांश कार्बन मिट्टी में मौजूद है। वर्गों की बात करें तो रिपोर्ट के अनुसार 0.21 (अति न्यूनतम) प्रतिशत वाली 13 प्रतिशत भूमि हैं। इसके साथ ही .21 से .51 तक 81 प्रतिशत भूमि है। मात्र छह प्रतिशत भूमि ही .51 जीवांश कार्बन दर वाली बची है।
पेड़ों और मेड़ों की कमी से मर रहे सूक्ष्म जीव
अलीगढ़ मंडल के उप निदेशक कृषि शोध वीके सचान के अनुसार जीवांश कार्बन कम होने के पीछे पेड़, खेत की मेड़ और गोबर के वर्तमान में इस्तेमाल न होना सबसे बड़ा कारण हैं। किसान अब खेतों पर मेड़ नहीं बनाते, जिसके कारण बारिश का पानी खेतों से बह जाता है।
मेड़ नहीं होने के कारण अब खेतों में छांवदार पेड़ भी नहीं लगाए जाते। पहले पेड़ होते थे, तो गर्मी के सीजन में धूप से बचने को सूक्ष्म जीव उसकी छांव में एकत्रित हो जाते थे। मगर, अब पेड़ न होने के कारण सूक्ष्म जीव मर जाते हैं। तीसरा सूक्ष्म जीवों का मरने का सबसे बड़ा कारण रसायनिक खाद भी हैं। पहले गोबर को मिट्टी के गड्ढे में सड़ाने के बाद खेत में डाला जाता था, जिससे की वह उर्वरक क्षमता को बढ़ा दें। मगर, अब किसान कच्चा गोबर डाल देता है। इससे निपटने के लिए विभाग किसानों को लगातार जागरूक कर रहा है। आगामी दिनों में किसान पाठशालाओं में भी इस बात की जानकारी दी जाएगी।