अभिषेक शर्मा, अमर उजाला, अलीगढ़।
बात ज्यादा पुरानी नहीं, वर्ष 2007 की है। जब विधानसभा चुनाव की टिकट को लेकर मारामारी मची हुई थी, खुद ख्वाजा हलीम छर्रा से टिकट के दावेदार थे और पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने उनकी टिकट फाइनल कर दी थी।
मगर ठा. राकेश सिंह अखिलेश यादव से करीबी के दम पर उनका टिकट कटवाकर खुद टिकट लेकर आए थे। युवा और बुजुर्ग की इस लड़ाई में नौ बार उनको टिकट कटने और दिए जाने की घोषणा लखनऊ स्तर से हुई।
बाद में टिकट राकेश को मिला। इस पर उन्होंने पार्टी से किनारा करते हुए बयान दिया था कि राजनीति में इतना बड़ा अपमान कभी नहीं हुआ। वापसी के सवाल पर कहा था कि नेताजी मुलायम सिंह यादव अगर जहर का प्याला भी पिलाएंगे तो वह पी लेंगे। बाद में सरकार आने पर आजम खान के प्रयास से वह पार्टी से जुड़े थे और उन्हें पर्यटन सलाहकार बनाया गया था।
यह अपने आप में एतिहासिक तथ्य था कि टिकट वितरण को लेकर सपा में 20 दिन तक चले हाईप्रोफाइल ड्रामे में 9 बार ख्वाजा हलीम को टिकट मिलने और कटने का एलान हुआ।
वह निश्चिंत थे कि नेताजी ने कभी उनकी बात नहीं टाली। मगर वह खुद हैरत में थे, जब पार्टी में बुजुर्ग बनाम युवा लड़ाई शुरू हुई। इसके बाद जब उनकी टिकट कट गई और पार्टी से किनारा कर लिया तो उसी चुनावी दौर में नुमाइश मैदान में सभा करने आए मुलायम सिंह यादव की पहली ऐसी रैली रही, जिसमें ख्वाजा हलीम मंच से गायब थे।
उसी समय लोगों ने उनको लेकर यह मान लिया था कि अब उन्होंने पार्टी से किनारा कर लिया। मगर बाद में सरकार बनने पर उन्हें सरकार में पर्यटन विभाग में सलाहकार बनाकर महत्व दिया गया और वह पार्टी के लिए काम करते रहे।
ख्वाजा हलीम बेहद मिलनसार, सामाजिक व्यक्ति थे। ख्वाजा हलीम जैसे व्यक्ति का निधन राजनीतिक क्षेत्र में बड़ी क्षति है। हम उन्हें पार्टी की ओर से व निजी तौर पर नमन करते हुए श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं।-चौ.बिजेंद्र सिंह पूर्व सांसद