आशीष निगम, अमर उजाला, अलीगढ़।
रोडवेज में करोड़ों रुपयों के फर्जी टिकट घोटाले में जिस टिकट मशीन को जरिया बनाया गया, उसका इस्तेमाल पांच राज्यों में किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश के सभी डिपो में इस कंपनी की ही मशीनें काम कर रही हैं।
हालांकि अभी अन्य कहीं से इस किस्म के फर्जीवाड़े की जानकारी सामने नहीं आई पर इसकी आशंका से इंकार भी नहीं किया जा सकता। वर्तमान में ट्राइमैक्स कंपनी की मशीनें ही उत्तर प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान और पश्चिम बंगाल की बसों में टिकट काट रही हैं ।
यूपी रोडवेज में इलेक्ट्रानिक टिकट मशीन की शुरुआत वर्ष 2008-09 में हुई। सबसे पहली मशीन माइक्रो एफएक्स नाम की थी। पांच साल तक ये मशीन चली और सैकड़ों खामियों और शिकायतों के बाद इसको बदला गया। वर्ष 2013 में मुंबई की कंपनी ट्राइमैक्स ने यूपी रोडवेज को इलेक्ट्रानिक टिकट मशीन की सप्लाई की है।
एक मशीन की कीमत 20 हजार 765 रुपये है। ये एक ऑनलाइन मशीन की तर्ज पर काम करती है। जिसमें कुल 28 तरह की रिपोर्ट और टिकट निकाले जा सकते हैं। रिपोर्ट का डाटा एक सर्वर में डाउनलोड किया जाता है। जिसका जरूरत पड़ने पर आकलन होता है। इसके अलावा रोजाना दौड़ने वाली बसें, उनमें चलने वाली ईटीएम, मुसाफिरों की संख्या, उनकी टिकट संख्या उनसे मिले किराये का हिसाब किताब भी इसी मशीन से रखा जाता है।
ये मशीन सबसे पहले मुंबई ईस्ट और बेस्ट बस सेवा में इस्तेमाल में लाई गई। इसके बाद राजस्थान की सरकारी बसों में इसका प्रयोग हुआ। यूपी में यह मशीन वर्ष 2013 में आई, जब ट्राईमैक्स कंपनी को पूरे उत्तर प्रदेश में इलेक्ट्रानिक टिकट मशीन देने और उनको चलाने का ठेका मिला। ये काम सपा की अखिलेश यादव सरकार के वक्त हुआ।
इस के कुछ दिन बाद ही बंगलुरू और दिल्ली की सरकारी बसों का काम भी इसी कंपनी को मिल गया। हाल ही में पश्चिम बंगाल की बसों में भी इस मशीन से टिकट कटने लगा है। वर्तमान में ये कंपनी महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान और यूपी के साथ पश्चिम बंगाल में बसों के इलेक्ट्रानिक टिकट का कामकाज संभालती है। यानी आठ से दस साल के सफर में ही आधा हिंदुस्तान इस एक कंपनी के पास आ चुका है।
इन मशीनों से टिकट की जगह कलेक्शन रिपोर्ट थमाने का गोरखधंधा केवल यूपी के अलीगढ़ और आगरा परिक्षेत्र में सामने आया है। बाकी कहीं भी इस मशीन से टिकट फर्जीवाड़े का इतना बड़ा मामला अब तक पता नहीं चला है।
अलीगढ़ के ट्राईमैक्स कंपनी के टीम लीडर शाहिद परवेज कुल 30 कर्मियों के स्टाफ के साथ पूरा डाटा रिकार्ड रखते हैं। मशीनों के खराब होने पर उनको दुरुस्त करते हैं। उन्होंने बताया कि ईटीएम से एक एक टिकट और रिपोर्ट देखने की व्यवस्था है।
डिपो प्रभारी चाहते तो नहीं होता फर्जीवाड़ा : मुनेंद्र
लगातार 25 साल से रोडवेज कर्मचारी संयुक्त परिषद के मंडल अध्यक्ष मुनेंद्र पाल सिंह दावे से कहते हैं कि अगर डिपो प्रभारी ठान लें तो टिकटों में किसी तरह का फर्जीवाड़ा नहीं हो सकता है और न ही रोडवेज के नाम से फर्जी बसें दौड़ सकती हैं। रोडवेज के फर्जी टिकट माफिया के गुर्गों से उनकी भी कई बार कहासुनी हुई, जब वह अलीगढ़ डिपो के प्रभारी थे। माफिया के गुर्गों ने उनका तबादला कराने के लिए कई बार धरना प्रदर्शन किया, लेकिन उस दौरान बसों से होने वाली आय को देखते हुए प्रबंधन ने उनका साथ दिया। बसों से अधिक से अधिक आय करने के मामले में एक दर्जन बार उनको प्रशस्ति पत्र से नवाजा गया। मुनेंद्र कहते हैं कि घोटाला तभी होगा जब रोजाना की टिकट कमाई की जांच पड़ताल नहीं होगी।