दुबई में जब घर याद आया तो रफी ने गाना सुनाया
ब्यूरो, अमर उजाला, अलीगढ़।
दुबई में रह रहे अलीगढ़ के फरहत नूर जब 1977 में वहां पहुंचे तो खुद को वतन से बेहद अलग महसूस कर रहे थे। उसी वक्त उन्हें दुबई के शेख रशीद ऑडिटोरियम में मो. रफी की यादगार नाइट में जाने का मौका मिला। मो. रफी की उस नाइट ने अपने वतन से दूरी की खलिश कम कर दी। एएमयू के छात्र रहे फरहत नूर ने यह बात जब कुछ वर्षों पहले दुबई के एएमयू के एक और पूर्व छात्र रूपेश पाठक को बतायी तो रूपेश पुण्य तिथि से पहले उस ऑडिटोरियम में मो. रफी की यादगार देखने जा पहुंचे। दुबई से रूपेश ने बताया है कि किस प्रकार वहां अलीग समुदाय रफी की पुण्य तिथि पर कार्यक्रम आयोजित कर रहा है।
रूपेश पाठक ने बताया कि यहां पर इंडियन रेस्टोरेंट आदि में पहले से ही 31 जुलाई के लिए सीटें बुक कर दी गई हैं। इनमें मुंबई के कलाकार मो. रफी के गीतों की प्रस्तुति देंगे। कार्यक्रम में अलीगढ़ ही नहीं बल्कि भारत और पड़ोसी देशों के अन्य शहरों से भी लोग शामिल होते हैं। उन्होंने बताया कि जिस शेख रशीद ऑडिटोरियम में मो. रफी ने प्रस्तुति दी थी वह इंडियन स्कूल का ऑडिटोरियम है।
नीरज के पहले फिल्मी गीत को दी रफी ने आवाज
1960 के दशक में गीतकार गोपाल दास नीरज ने मायानगरी में दस्तक दी। मशहूर फिल्म निर्माता आर चंद्रा ने जब अपने बेटे को लांच करने के लिए फिल्म ‘नई उमर की नई फसल’ बनायी तो उसमें नीरज का गीत ‘कारवां गुजर गया गुबार देखते रहे’ रखा। इस गीत को मो. रफी ने अपनी आवाज दी और रोशन ने संगीत दिया। इसके बाद तो मो. रफी ने नीरज के कई सुपरहिट गीतों को अपना स्वर दिया। नीरज कहते हैं मो. रफी महान गायक ही नहीं बल्कि महान इंसान भी थे।