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निर्भया कांड : हादसा एक बार, जबकि कुरेदा जाता है बार-बार

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हादसा एक बार, जबकि कुरेदा जाता है बार-बार
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ब्यूरो, अमर उजाला अलीगढ़।

अलीगढ़। पांच साल पहले 16 दिसंबर को दिल्ली में हुए निर्भया कांड ने जहां पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था। वहीं छोटे-छोटे शहरों में भी महिला सुरक्षा और इससे जुड़े कानूनों पर नई बहस को जन्म दिया गया। कानूनन व अधिकार मिलने और सख्त सजा के प्रावधान के बाद भी जिले में कई निर्भया जैसी लड़कियां इंसाफ के लिए इंतजार कर रही हैं। अधिवक्ता सरदार मुकेश सैनी एडवोकेट कहते हैं कि जिला स्तर पर अदालतों में दो हजार से अधिक दुष्कर्म आदि के मामले लंबित पड़े हैं। समाज शास्त्री डॉ. उमेश दीक्षित और मनोविज्ञानी डॉ. रामकिशन कहते हैं कि पीड़िता के साथ तो वह दुर्घटना एक बार होती है, लेकिन इंसाफ पाने की कवायद में हर बार उसके जख्म को कुरेदा जाता है।

केस नंबर एक
हरदुआगंज इलाके में स्कूल जा रही छात्रा से सामूहिक बर्बरता की गई। साथ ही उसकी हत्या कर दी गई। इस मामले में पीड़ित परिवार ने आरोपियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया तो परिवार को ही धमकाया गया। इसके बाद एक और मुकदमा दर्ज करया गया। इस मामले में पीड़ित परिवार को अभी भी इंसाफ का इंतजार है।
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केस नंबर दो
थाना बन्ना देवी के नगला कलार इलाके में दुष्कर्म पीड़िता के परिवार ने घटना के कुछ समय बाद गर्भवती हुई पीड़िता के गर्भपात की इजाजत मांगी थी, लेकिन प्रक्रिया के फेर में उसे इजाजत तो नहीं मिली और अब पीड़िता करीब आठ महीने की गर्भवती है।

केस नंबर तीन
जवां इलाके में सौ फीसदी दिव्यांग महिला के साथ दुष्कर्म किया गया। इस मामले में आरोपी ने सजा भी पूरी कर ली। लेकिन शासन की ओर से पीड़िता कोे मिलने वाली आर्थिक मदद 15 हजार आज तक नहीं मिली है।

इस तरह हरे हो जाते हैं पीड़िताओं के जख्म
- मामले कई साल तक चलते हैं। किशोरी विवाह योग्य हो जाती है, लेकिन अदालती चक्करों के चलते उसकी शादी नहीं हो पाती है।
- जिसके साथ दुष्कर्म होता है। समाज में उसी को दोषी समझा जाता है और सही दृष्टिकोण से नहीं देखा जाता।
- सुनवाई के दौरान कई बार पीड़िता के लिए बेहद असहज स्थिति पैदा हो जाती है।
‘निर्भया कांड के बाद जुवेनाइल कानून में यह बदलाव आया कि अब ऐसे जघन्य अपराधों में वयस्क और अवयस्क समान रूप से सजा काटेंगे। अवयस्क की परिधि समाप्त कर दी। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने यह प्रावधान किया है कि घटना के बाद छह महीने के अंदर ही ऐसे मामलों को निस्तारित किया जाएगा। लेकिन व्यवहार में ऐसा संभव नहीं हो पा रहा है।’
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- सरदार मुकेश सैनी एडवोकेट
‘मेरे अस्पताल में डाक्टरी परीक्षण के लिए 50 से 60 वर्ष तक की महिलाएं आती हैं। जिनके साथ घटना हुई होती है। हैरत होती है कि वह कौन लोग हैं जो इस तरह की घटनाओं को अंजाम देते हैं। इसके अलावा कुल मामलों में से 10 फीसदी मामले किशोरियों के संबंध में भी होते हैं। समाज को अभी अपनी मानसिकता और दृष्टिकोण को बदलने की जरूरत है।’
- डॉ. गीता प्रधान, सीएमएस जिला महिला अस्पताल।
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