जब नीरज ने कहा था कि गीत की लौ को रौशन रखना विष्णु...
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प्रख्यात गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने साझा किए नीरज के साथ के अनछुए पहलू
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सिकंदराराऊ।
गीत सम्राट गोपालदास नीरज का निधन साहित्य की दुनिया के लिए अपूर्णनीय क्षति है। उनके गीत सदियों के लिए अमर हैं। नीरज के निधन से व्यथित प्रख्यात गीतकार डॉ. विष्णु सक्सेना ने शुक्रवार को नगर स्थित अपने क्लीनिक पर कविराज नीरज के साथ बिताए अनछुए पहलुओं को साझा किया।
डॉ. विष्णु सक्सेना ने कहा कि गीत कविता के प्राण हैं औश्र कवि सम्मेलन की आत्मा हैं। हास्य एवं वीर रस कवि, सम्मेलन का शरीर तो हो सकते हैं लेकिन आत्मा नहीं। जिस दिन गीत समाप्त हो जाएंगे, कवि सम्मेलन खत्म हो जाएंगे। नीरज जी उन्हें गीत रूपी आत्मा में को बचाकर रखने की सीख दी थी।
डॉ. विष्णु ने बताया कि जब वह कक्षा पांच में पढ़ते थे तब पिता नारायण प्रकाश के साथ कवि सम्मेलन सुनने जाते थे। वहां नीरज जी की कविताएं और गीत सुनकर वह मंत्रमुग्ध हो गए। उस दिन कवि बनने की ठान ली थी। 1992 में बरेली में एक कवि सम्मेलन में उनके गीत से प्रभावित होकर नीरज जी ने उनकी पीठ-थपथपाई थी। उन्हाेंने माला पहनाकर कहा था कि यह खुशी की बात है कि विष्णु मेरे जिले के हैं (उस समय सिकंदराराऊ अलीगढ़ जिले में था)। अब मुझे लग रहा है कि गीत की लौ मेरे बाद नहीं बुझेगी। डॉ. विष्णु कहते हैं कि वह पल अविस्मरणीय था। डॉ. विष्णु ने नीरज जी की याद में एक गीत भी समर्पित किया है...।
रंग बिरंगे इस जीवन में ,
कुछ रंग फीके कुछ रंग गहरे,
कुछ रंग आवारा बादल से,
कुछ रंगों पर बैठे पहरे,
कर्म भूमि की इस दुनिया में ,श्रम तो सबको करना होगा,
प्रभु तो सिर्फ लकीरें देता, रंग हमको ही भरना होगा,
जीवन के रूठे पन्नों में भरने होंगे रंग सुनहरे...।