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बड़े आदमियों से खाली हो गया अलीगढ़ शहर.....

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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
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ज्ञानपीठ विजेता शहरयार, पद्मभूषण गोपाल दास नीरज और पद्मश्री प्रो. काजी अब्दुल सत्तार। अलीगढ़ के लोग इनका नाम फख्र से लेते हैं। अपनी रचनाओं की वजह से तीनों ने वैश्विक पहचान बनाई थी। ये सभी अलीगढ़ के गौरव थे। परंतु काजी अब्दुल सत्तार के जाने के बाद अलीगढ़ बड़े आदमियों से खाली हो गया।

यह कहना है कि एएमयू उर्दू विभाग के प्रो. मेहताब हैदर नकवी का। वह प्रो. काजी अब्दुल सत्तार के शागिर्द भी रह चुके हैं। उनका कहना है कि 1976 में वह छात्र थे और काजी साहब लेक्चरर थे। उन्होंने अदबी एकेडमी नाम की एक संस्था बनायी थी। मुझे उसका सेक्रेटरी बनाया था। उस संस्था के जलसे उनके घर पर होते थे।
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उस समय काजी साहब सुलेमान हॉल के सामने पैराडाइज रेस्तरा के ऊपर रहते थे। जलसे में हिंदुस्तान के हिंदी एवं उर्दू के साहित्यकारों को बुलाया जाता था। वह कहते है कि काजी साहब हिंदी एवं उर्दू साहित्य के बीच पुल का काम करते थे। इसलिए उनके जाने से हिंदी-उर्दू साहित्य ही नहीं बल्कि जनवादी लेखक संघ को भी बड़ी क्षति हुई है।

उन्होंने अपने लिए कुछ नहीं किया। पूरा जीवन साहित्य के प्रति समर्पित कर दिया। उनका ओढ़ना-बिछौना साहित्य था। प्रो. नकवी कहते है कि एएमयू के उर्दू विभाग में उनके कई शागिर्द आज भी मौजूद है।

प्रो. काजी अब्दुल सत्तार का स्टाइल उर्दू में सबसे अलग था। बहुत कम शब्दों में ज्यादा बात कहने का हुनर जानते थे। हम लोग आज जो कुछ भी हैं, उन्हीं की तरबियत का नतीजा है। शागिर्दों से बेपनाह मुहब्बत करते थे। उन्होंने अपने समय में कहानी का पूरा वातावरण बना दिया था। उनकी हर रचना की दो सतह होती है। एक आम पाठक के लिए और दूसरा बौद्धिक लोगों के लिए। बौद्धिक लोगों को उनकी रचनाओं में गहराई, पेचीदगी और दर्शन आता है।
- प्रो. तारिक छत्तारी, विभागाध्यक्ष, एएमयू उर्दू विभाग

प्रो. काजी अब्दुल सत्तार मेरे उस्ताद थे। वे काव्य एवं उपन्यास का पेपर पढ़ाते थे। वे छात्रों में काफी दिलचस्पी लेते थे। शिक्षक बनने के बाद भी मेरे साथ उस्ताद की तरह व्यवहार करते थे। शोखी करने पर डांटते भी थे। उनके अंदर आकर्षण था। वह चीजों को बढ़ा-चढ़ा कर कहते थे। बहुत ही खूबसूरत जबान इस्तेमाल करते थे।
- प्रो. अकील अहमद, पूर्व चेयरमैन, उर्दू विभाग, एएमयू

आजादी के बाद जो हालात बने, उसे उन्होंने अपनी कहानियों में खूबसूरती से प्रस्तुत किया। ‘पीतल का घंटा’ उसका नमूना है। उनके उपन्यासों के किरदार हमलोगों को प्रेरित करते हैं। उनके निधन से उर्दू साहित्य का अपूरणीय क्षति हुई है।
- अब्दुल हफीज खान, छात्र, उर्दू विभाग

प्रो. काजी अब्दुल सत्तार के उपन्यास बेजोड़ हैं। उसे पढ़ते समय हम खुद को उसी दुनिया में पाते हैं। वतन से प्रेम गंगा जमुनी संस्कृति उनकी कहानियों में देखने को मिलती है। वह वर्तमान समय के सबसे बड़े कहानीकार थे।
- मो. आदिल, छात्र, उर्दू विभाग

काजी अब्दुल सत्तार का निधन उर्दू उपन्यास एवं कथा साहित्य के लिए अपूरणीय क्षति है। उन्होंने अपने उपन्यासों में समाज के विभिन्न पहलुओं को इस तरह पेश किया है कि वह पाठकों के जेहन को झिंझोड़ डालते हैं।
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- डॉ. फुरकान संभली, प्रवक्ता, वीमेंस कॉलेज

पाक ने वीसी बनाने का दिया था ऑफर
एएमयू उर्दू अकादमी के डायरेक्टर डॉ. राहत अबरार कहते है कि प्रो. काजी अब्दुल सत्तार को पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल जियाउल हक ने करांची विश्वविद्यालय का कुलपति बनाने का आफर दिया था, जिसे उन्होंने यह कहकर अस्वीकार कर दिया था कि मैं अपने देश का पद्मश्री हूं। वह कहते है कि एक लेखक के रूप में काजी साहब की नजर वर्तमान, भूत एवं भविष्य पर रहती है। इंटरनेट आज की बात है लेकिन उन्होंने अपनी रचनाओं में इसके संकेत बहुत पहले दे दिया था।
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