डेस्क न्यूज, अमर उजाला, अलीगढ़
हिंदी पत्रिका वाङ्गमय के नए प्रवासी अंक पर ओहद रेजीडेंसी कार्यालय में परिचर्चा का आयोजन किया गया।
हिंदी साहित्य के वरिष्ठ आलोचक डॉ. प्रेम कुमार ने कहा कि यह अंक साहित्य की विद्याओं से अलग है। जो भारतीय विदेश में साहित्य लिख रहे हैं, उनके दर्द, पीड़ा और भावनात्मक रिश्तों का साहित्य है, जिसके माध्यम से हमें विदेश की संस्कृति, समाज व संस्कार का पता चलता है कि किस प्रकार भारतीय वहां आधुनिक होते हुए भी आज भी पूर्णतया भारतीय रंग-ढ़ंग में बने हुए है। अपने तीज-त्यौहार उसी प्रकार मनाते हैं, जितने हर्ष एवं उल्लास से भारत में मनाते थे।
विदेशी संस्कृति में रहते हुए भी अपनी संस्कृति, संस्कार और भारतीयता को बचाए रखना सच में बहुत बड़ी उपलब्धि है। परिचर्या में डॉ. एम फिरोज खान, उप संपादक अकरम हुसैन, डॉ. शगुफ्ता नियाज, तरन्नुम नियाज, अंबरीन आफताम, मनीष कुमार गुप्ता, आसिफ अली साबरी आदि मौजूद थे।