क्राइम डेस्क, अमर उजाला, अलीगढ़।
प्रधान बनने के बाद सरकारी नौकरी पाने और एसडीएम के आदेश के बाद भी पद न छोड़ने के मुकदमे में खैर के गांव सभापुर के तत्कालीन प्रधान कालीचरण को अदालत ने दोषी करार दे दिया है। न्यायालय ने 24 साल तक चले मुकदमे के बाद प्रधान को दो साल की सजा और दस हजार रुपया अर्थदंड जमा कराने के आदेश दिए हैं।
यह था मामला
एसपीओ चंद्रप्रकाश गौतम ने बताया कि पंचायत चुनावों में खैर तहसील के गांव सभापुर से कालीचरन को प्रधान चुना गया था। इस बीच 26 अगस्त 1991 को उनकी नौकरी फिरोजाबाद टूंडला स्थित केनरा बैंक में बतौर गार्ड/चपरासी पद पर लग गई। तत्कालीन एसडीएम खैर ने पंचायती राज एक्ट की धारा पांच क/ख में आदेश दिए कि वह अपना पद छोड़ दें और अपना पदभार उप प्रधान मोहन को सौंप दें, लेकिन उसने ऐसा नहीं हुआ और एसडीएम के आदेश के विरुद्ध हाईकोर्ट में रिट दाखिल कर दी।
25 फरवरी 1994 को न्यायालय ने यह कहते हुए याचिका खारिज कर दी कि यह स्वीकार करने योग्य नहीं है। आवेदक ने एसडीएम के आदेश के खिलाफ उच्चाधिकारियों के न्यायालयों की उपेक्षा कर सीधे हाईकोर्ट में रिट डाली है। उसे पहले वहां अपील करनी चाहिए थी। इसके बाद सहायक विकास अधिकारी पंचायत खैर ने नौ सितंबर 1994 को कालीचरण के खिलाफ पंचायती राज एक्ट की धारा 14 क के तहत थाना खैर में एफआईआर दर्ज करा दी।
विवेचक ने उसके खिलाफ न्यायालय में चार्ज शीट दाखिल कर दी। तब से यह मुकदमा चला आ रहा था। शनिवार को जेएम खैर मो. तौसीफ रजा ने आरोपी को दोषी करार देते हुए उसे दो साल की सजा और दस हजार रुपया जुर्माना की सजा सुनाई। अभियोजन पक्ष के अधिवक्ताओं ने कहा है कि वह पूर्व में फौज से सेवानिवृत्त हुआ है और बैंक में भी बतौर गार्ड/चपरासी नौकरी करने के बावजूद एसडीएम के आदेशानुसार प्रधानी छोड़ने को राजी नहीं हुआ और बेवजह के मुकदमे डालकर गुमराह करने की कोशिश करता रहा।