प्रतिवादियों ने दिए थे ये तर्क
प्रतिवादी पक्ष की ओर से यह तर्क दिया गया था कि स्वर्गीय सखावत हुसैन 1980 से एएमयू में कार्यरत थे और यूनिवर्सिटी उनकी तनख्वाह से हाउस रेंट अलाउंस (एचआरए) काटती थी, इसलिए वे बतौर किरायेदार वहां आबाद हैं। उन पर रेंट कंट्रोल एक्ट लागू होता है। हालांकि, अदालत ने दोनों पक्षों के साक्ष्यों और दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पाया कि डीड के अनुसार एएमयू इस संपत्ति का वैध मुतवल्ली है। प्रतिवादी यह साबित करने में असफल रहे कि वे संपत्ति के किरायेदार थे, बल्कि साक्ष्यों से स्पष्ट हुआ कि वे केवल केयरटेकर के रूप में वहां रहे थे।
अदालत का आदेश
अदालत ने एएमयू के पक्ष में डिक्री करते हुए आदेश दिया है कि प्रतिवादी एक महीने के भीतर विवादित संपत्ति से अपना कब्जा हटाकर वास्तविक कब्जा अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को सौंप दें। वाद दायर करने से लेकर कब्जा मिलने की तारीख तक 200 रुपये प्रति माह की दर से हर्जाना अदा करें। आदेश का पालन नहीं करने पर यूनिवर्सिटी न्यायालय के माध्यम से कब्जा और हर्जाने की राशि वसूलने के लिए स्वतंत्र होगी।
हम यहां 40 साल से रह रहे हैं। मेरे पिता एएमयू के कर्मचारी रहे। एएमयू ने 21 साल से किराया नहीं लिया। जो भी फैसला आया है उसको हम ऊपरी अदालत में चुनौती देंगे।-मुनिस खान, सखावत हुसैन पक्ष
अदालत के फैसले के बाद अब एएमयू अपनी जमीन पर कब्जा लेगा। एएमयू की जमीन को सुरक्षित किया जाएगा।-प्रो. मोहम्मद नवेद, प्रॉक्टर, एएमयू