फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

विश्व को शांति का संदेश दे रहा है जसराजपुर

विज्ञापन
जसराजपुर में बना कंबोडियन बौद्ध विहार - फोटो : MAINPURI
विज्ञापन
मैनपुरी। विश्व में शांति की स्थापना करने वाले महात्मा बुद्ध के चरणों से पावन हुई जसराजपुर की धरा विश्व में शांति का संदेश दे रही है। बौद्ध आस्था का केंद्र जसराजपुर आज पूरे विश्व में विख्यात हो चुका है। इसी पावन धरती से दो बार तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा भी विश्व शांति का संदेश दे चुके हैं।
विज्ञापन

जिले की सीमा से लगे फर्रुखाबाद के गांव संकिसा में कभी भगवान बुद्ध ने अपने उपदेश दिए थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार संकिसा से ही सटे मैनपुरी के गांव जसराजपुर में भी उन्होंने भ्रमण किया था। तब से संकिसा के साथ-साथ जसराजपुर भी महात्मा बुद्ध की धर्मस्थली बन गया। सदियों बाद अब फिर एक बार जसराजपुर पूरी दुनिया को विश्व शांति का संदेश दे रहा है। कंबोडिया, चीन, श्रीलंका, नेपाल, बर्मा, इंडोनेशिया, जापान समेत कई अन्य देशों के उपासक यहां शांति के लिए आते हैं। काली नदी के किनारे बसा गांव जसराजपुर बौद्ध उपासकों की धर्मस्थली बन गया है।
यहां कंबोडिया, दक्षिण कोरिया और बर्मा के बौद्ध विहान बने हुए हैं। दूसरे देशों से आने वाले लोग यहां भगवान बुद्ध और शांति प्राप्त करने के लिए उपासना करते हैं। ये वहीं जसराजपुर हैं, जिसकी पावन धरा पर दो बार तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा भी आ चुके हैं। वर्ष 2015 और 2018 में दलाई लामा यहां तीन दिवसीय प्रवास और प्रवचन के लिए आ चुके हैं। उन्होंने यहां से दुनिया भर को विश्व शांति का संदेश दिया था। साल भर यहां दूसरे देशों से यात्रियों का आना-जाना लगा रहता है। जिले में अब जसराजपुर को शांति के उपासना स्थल के रूप में जाना जाने लगा है।
विज्ञापन

यहां है भारत का सबसे ऊंचा गज स्तंभ
जसराजपुर में देश का सबसे ऊंचा गज स्तंभ भी स्थापित है। वर्ष 2015 में तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने 80 फीट ऊंचे इस गज स्तंभ का पूजन किया था। इस स्तंभ को चुनार के पत्थर से बनाया गया है। इसके निर्माण में करीब साढ़े तीन साल का समय लगा था और इस पर एक करोड़ रुपये का खर्च आया था। वहीं बौद्ध तीर्थ स्थली संकिसा में भी एक गज स्तंभ स्थापित है। इतिहासकारों का दावा है कि 35 फीट लंबे इस गज स्तंभ को खुद सम्राट अशोक ने बनवाया था। ये गज स्तंभ आज भी मौजूद है।
भारत-चीन को करीब आने की दी थी नसीहत
31 जनवरी 2015 को तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा जसराजपुर आए थे। यहां प्रवचन व अन्य कार्यक्रमों में शामिल होने के दौरान उन्होंने भारत और चीन को गिले शिकवे मिटाकर शांति स्थापित करने की नसीहत दी थी। उन्होंने कहा था कि दोनों देशों को एकसाथ मिलकर आगे बढ़ना चाहिए।
1982 में हुई थी शुरुआत
विश्व के देशों और लोगों के बीच में शांति बनाए रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 1981 में विश्व शांति दिवस मनाने की घोषणा की थी। इसके बाद पहली बार वर्ष 1982 में पहली बार विश्व शांति दिवस मनाया गया। वर्ष 2001 तक हर साल सितंबर माह के तीसरे मंगलवार को विश्व शांति दिवस मनाया जाता था, लेकिन वर्ष 2002 से इसके लिए 21 सितंबर की तरीख निर्धारित कर दी गई। तब से इसे 21 सितंबर को मनाने का सिलसिला जारी है।
सफेद कबूतरों को उड़ाने की है परंपरा
सफेद कबूतर को शांति का दूत माना जाता है। इसके कारण विश्व शांति दिवस पर सफेद कबूतरों को उड़ाने की परंपरा है। सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि कई अन्य देशों में भी लोग सफेद कबूतरों को उड़ाकर विश्व शांति का संदेश देते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें