मुगल खंडहर में तबदील बादशाह जहांगीर के बेटे परवेज का मकबरा
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मुगल बादशाह जहांगीर के बेटे परवेज का मकबरा खंडहर में तबदील हो गया है। इस तक जाने का रास्ता बंद है। मकबरे में कूड़ा डाला जा रहा है। अंग्रेजों के समय तक यह बेहद खूबसूरत मकबरा था। इसे समरकंद स्थित तैमूर के मकबरे के डिजाइन पर बनाया गया था। इसके चारों ओर दिलकश बगीचे थे। आज न बगीचे हैं और न ही मकबरे की चहारदीवारी बची है।
अंग्रेजों ने इसकी जमीन को नीलाम कर दिया था। आजादी के बाद इसे संरक्षित नहीं किया गया। इसलिए इसकी यह दुर्दशा है, जबकि इतिहास के पन्नो में परवेज की दास्तान बड़ी ही दिलचस्प है। जहांगीर के बेटों में शाहजहां और खुसरो की जगह परवेज भी तख्त का दावेदार था। उसकी मां साहिब जमाल जहांगीर की तीसरी पत्नी थी। परवेज की बेटी नादिरा बानो बेगम से शाहजहां के बेटे शहजादा बुलंद इकबाल दारा शिकोह का निकाह हुआ था। दक्कन की लड़ाई में शिकस्त के बाद जहांगीर का भरोसा परवेज से उठ गया था।
परिसर में चल रही है नर्सरी
इतिहासकार राज किशोर राजे ने बताया कि इस मकबरे की खोज के लिए उन्हें बड़ी मशक्कत करनी पड़ी। आज इसके परिसर में नर्सरी चल रही है। मकबरा खंडहर हो चुका है। यह एक आलीशान और दिककश बगीचे के केंद्र में था। बगीचे में आराम बाग ( अब रामबाग ) की तरह खूबसूरत फूल और मेवों के दरख्त थे।
बुरहानपुर में हुई थी मृत्यु
38 साल की उम्र में परवेज की मृत्यु 1627 में बुरहानपुर में हुई थी। बाद में शव को आगरा लाकर दफनाया गया। अंग्रेजों ने मकबरे का बाग और जमीन नीलाम कर दी थी। तभी से इसकी अनदेखी शुरू हो गई। आजादी के बाद सरकार ने इसके आसपास के मकबरे तो संरक्षित किए लेकिन इसे नहीं किया।
रिवर फ्रंट योजना में हो सकता है संरक्षित
दो साल पहले रिवर फ्रंड डवलपमेंट की योजना बनी। इसमें यमुना किनारा को विकसित किया जाना है। इसमें इस मकबरे को संरक्षित किए जाने की योजना भी बनाई गई थी। हालांकि उस पर अब तक काम नहीं हुआ।
ऐसे पहुंचे - एत्माद्दौला थाना के सामने से रास्ता गया है। कटरा वजीर खां पहुंचने पर मकबरे का रास्ता है।