विश्वदाय स्मारक ताज, किला और सीकरी के अतिरिक्त भी आगरा में एतिहासिक धरोहरों की बड़ी संख्या है लेकिन जानकारी के अभाव में पयर्टक इन तक नहीं पहुंच पाते। उम्र की मार झेल रहे इन स्मारकों को सहेजने पर भी ध्यान की है। अनदेखी का नतीजा है कि इतिहास के पन्नों में खास अहमियत रखने वाली इन धरोहरों की चमक -दमक खोती जा रही है। 19 से 26 नवंबर तक चलने वाले विश्व धरोहर सप्ताह में हम आपको ऐसी ही अनूठी धरोहरों से रूबरू कराएंगे। शुक्रुल्लाह शीराजी अफजल खां ‘अल्लामी’ ने अपने लिए ऐसा शानदार मकबरा बनवाया था जिसकी खूबसूरती को देखकर बादशाह शाहजहां भी हैरान रह गए थे। शीराजी शाहजहां के ही वजीर थे। हम बात कर रहे हैं चीनी के रोजा की। कभी यह मकबरा अपनी चमक के लिए ही मशहूर था, लेकिन आज बदहाल है। खास किस्म से तैयार की गई इसकी चमकदार टाइल्स उखड़ चुकी हैं। दीवारों का रंग फीका पड़ गया है। इस प्रचार प्रसार भी कम है। इसलिए मकबरे को देखने के लिए गिने चुने सैलानी ही पहुंचते हैं।
विज्ञापन
2 of 5
चीनी का रोजा एत्मादउद्दौला
- फोटो : अमर उजाला
मकबरे में चीनी मिट्टी का इस्तेमाल किया गया, इसलिए नाम पड़ा चीनी का रोजा। यह इमारत ईरान की विलुप्त हो चुकी काशीकरी कारीगरी से बनी है। इस कला से निर्मित पूरे भारत में एकमात्र यही इमारत है, जो अभी तक संरक्षित है। यमुना नदी के किनारे 390 साल पहले तामीर किया गया चीनी का रोजा स्मारक रामबाग के पास है। यह नीले रंग के ग्लेज्ड टाइल्स से बना है। हालांकिं ये टाइल्स टूटकर निकल चुके हैं। 1608 में ईरान के शहर शिराज से मुगल दरबार में आए मुल्ला शुक्रुल्लाह शिराजी को अफजल खां शिराजी का नाम दिया गया था।
विज्ञापन
3 of 5
चीनी का रोजा स्मारक
इतिहासकार राजकिशोर राजे ने बताया कि मुगल बादशाह जहांगीर के बाद शाहजहां के दरबार में शिराजी वित्त मंत्री का दायित्व संभाले हुए थे। 1639 में अफजल खां की मृत्यु लाहौर में हुई, लेकिन उनकी इच्छा के मुताबिक आगरा में दफनाया गया। शीराजी ने मकबरा अपने जीवनकाल में ही लगभग 1628 से 1639 के बीच बनवाया था।
4 of 5
चीनी का रोजा: जिसकी टाइल्स अब खराब हो रही हैं
- फोटो : अमर उजाला
टाइल्स का थोड़ा सा ही हिस्सा बचा
टाइल्स को इमारत के बाहर से लगाया गया है। ये नीला, पीला, हरा, नारंगी और सफेद रंग के हैं। एक-दो टाइल्स का कुछ हिस्सा ही बचा है। ईरान के काशान इलाके में यह कला सबसे ज्यादा प्रचलित थी, इसलिए टाइलों को काशी कहा जाने लगा।
अंग्रेजों ने बचाया चीनी का रोजा का अस्तित्व
1803 में जब आगरा ब्रिटिश हुकूमत के अधीन आया तो चीनी का रोजा अंग्रेजों की प्राथमिकता में था लेकिन 1835 में अंग्रेज अफसर फैनी पार्क्स ने चीनी का रोजा के रखरखाव की आलोचना की। इसके बाद 1899 तक यह बेहद खराब हालात में रहा। इसके अंदर किसान रहे और अपने बैलों को कब्रों के पास बांधते रहे। भारत के वायसराय और गवर्नर जनरल लार्ड कर्जन ने इस मकबरे की स्थिति पर नाराजगी जताई, तब यहां संरक्षण का काम शुरू किया गया।