जाति-मजहब की दीवार भले ही पूरी तरह से नहीं टूटी हों, लेकिन एड्स पीड़ितों में इसके कोई मायने नहीं। जाति-मजहब की बंदिशों को दरकिनार कर 56 दंपती एक-दूजे के हमसफर बने। मरीजों के घर बसाने का बीड़ा आगरा पॉजिटिव पीपल वेलफेयर सोसाइटी ने उठाया है। तीन जोड़े इसी महीने में सात फेरों के बंधन में बंधने वाले हैं।
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केस स्टडी एक:
मलपुरा निवासी युवती को एड्स की बीमारी का पता चला। परिजनों को बताया तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। जिंदगी की हार नहीं मानी और पढ़ाई-लिखाई जारी रखी। संस्था के यहां पंजीकृत कराया। इसी महीने शादी होने वाली है, होने वाले पति का दिल्ली में खुद का व्यापार है। जाति अलग होने पर परिजनों ने आपत्ति जताई, लेकिन संस्था के प्रयासों से वह जरूरत समझे और सोच बदली।
केस स्टडी दो
सैंया निवासी दंपती सात साल से सुखद वैवाहिक जीवन जी रहे हैं। पति-पत्नी दूध का काम करते हैं। परेशानी होने पर पति ने जांच की तो बीमारी की पुष्टि हुई। इस पर पत्नी की भी जांच की तो उसमें भी बीमारी मिली। जांच के बाद दोनों ने जीवन का अंत ही समझ लिया। दंपती संस्था के संपर्क में आए। संतान सुख के लिए चिकित्सकीय निगरानी में गर्भधारण किया और दो बेटे हैं और दोनों को बीमारी नहीं है।
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एसएन मेडिकल कालेज
- फोटो : अमर उजाला
संस्था के यहां आगरा-अलीगढ़ मंडल के 4986 मरीज पंजीकृत हैं। इनमें से जाति, रंगरूप और अमीर-गरीब का भेद भुलाकर आपसी सहमति से गृहस्थी बसा रहे हैं। रोजगार के लिए सिलाई-कढ़ाई, ब्यूटीशियन, मेहंदी, कंप्यूटर कोर्स का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।
संस्था अध्यक्ष अनिल राठौर ने बताया कि मरीजों में जीवनसाथी चुनने के लिए योग्यता, व्यवसाय समेत अन्य विवरण तैयार करते हैं। विवाह के विरोध में कई बार मरीज के परिजन खड़े होते हैं, लेकिन काउंसिलिंग के बाद उनकी सोच बदलती है।
एसएन मेडिकल कॉलेज के स्त्री रोग विभगाध्यक्ष डॉ. सरोज सिंह ने बताया कि चिकित्सकीय निगरानी में एड्स पीड़ित दंपती की होने वाली संतान को इस बीमारी से बचाया जा सकता है।
इस साल अभी तक एचआईवी से पीड़ित 34 गर्भवती के प्रसव कराए गए, जिसमें 21 सामान्य और 13 ऑपरेशन से प्रसव कराए, शिशु के 18 महीने का होने पर इनकी जांच की जाएगी।
एसएन मेडिकल कॉलेज के एआरटी सेंटर में 9,839 मरीज पंजीकृत हैं। इसमें सबसे ज्यादा असुरक्षित यौन संबंधों की वजह से 4,574 को बीमारी हुई। संक्रमित रक्त चढ़ने से 418 और संक्रमित सुई से 297 पीड़ित हुए।
643 को गर्भ से मर्ज मिला। 135 समलैंगिक और 505 मरीज सेक्सवर्कर हैं। 77 ट्रक चालक और 870 की वजह स्पष्ट नहीं हुई। एआरटी सेंटर प्रभारी डॉ. जितेंद्र दौनेरिया ने बताया कि अधिकांश लापरवाही से बीमारी के शिकार बने। इनको इलाज के साथ काउंसिलिंग भी की जाती है।
चिकित्सकों ने एचआईवी की जांच पर दिया जोर
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने रवि ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस शास्त्रीपुरम में संगोष्ठी करते हुए एड्स के प्रति जागरूक किया। मुख्य अतिथि एसएन कॉलेज के प्राचार्य डॉ. जीके अनेजा ने कहा बचाव से बेहतर कोई इलाज नहीं। उन्होंने स्वस्थ पुरुषों को भी एचआईवी की जांच कराने की सीख दी।
आईएमए अध्यक्ष डॉ. आरएम पचौरी ने घनी आबादी में शिविर लगाकर बीमारी की जांच और जागरूकता की जरूरत की बात कही। डॉ. आरती अग्रवाल और डॉ. टीपी सिंह ने कहा कि मरीजों को पौष्टिक भोजन, व्यायाम और साफ-सफाई पर विशेष ध्यान रखने की जरूरत है। कार्यक्रम में डॉ. हरेंद्र यादव, डॉ. मोहन भटनागर, डॉ. अरुण चतुर्वेदी, डॉ. शम्मी कालरा, डॉ. संजय चतुर्वेदी, डॉ. अनुपम गुप्ता, डॉ. आरके कंचन, डॉ. पंकज नगायच, डॉ. मुकेश चौहान रहे।