ज्योति ठाकुर, पूजा यादव और गीता चंद्रा
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औरत एक मां है और एक बेटी भी। बचपन में साइकिल चलाई, युवावस्था में स्कूटी लेकिन मन में कसक थी कि बाइक और कार क्यों नहीं चला सकते? अपने अंदर की इसी कशमकश को मिटाने के लिए उन्होंने रफ्तार को हमसफर बना लिया। अब आगरा की महिलाएं न केवल मोटर और बाइक रैली में प्रतिभा दिखा रही हैं बल्कि बेटियां बुलेट चला रही हैं।
ऐसा लगा मानो दुनिया जीत ली
खंदारी निवासी गीता चंद्रा ने बताया कि मैंने 52 की उम्र में कार चलना सीखा। 67 साल की उम्र में पहली बार मोटर कार रैली में पावर स्टीयरिंग थामी। ऐसा अनुभव था मानो दुनिया जीत ली। सेवानिवृत्ति के बाद ऐसा भी आया, जब मुझे अवसाद ने घेर लिया और लगता था कि जीने के लिए दो जोड़ी कपड़े और एक बिस्तर ही काफी हैं। फिर मैं आई सर्व खुशियों के पल ग्रुप से जुड़ी। यहां मुझे जीवन जीने का नया नजरिया मिला। मैंने ड्रम सीखा, डांस सीखा और अब गाना भी सीख रही हूं। स्टेज परफॉर्मेंस से भी डर नहीं लगता। वह सारे काम कर रही हूं जो मैं हमेशा से करना चाहती थी।
कुछ अलग करने की चाहत
बाइकर पूजा यादव ने बताया कि बचपन से कुछ अलग करने की चाहत थी। परिवार में बड़ी होने के कारण 19 साल में ही शादी हो गई। पति बाइक क्लब के सदस्य हैं। उनके साथ मैं भी राइडिंग में जाती थी। पता लगा की मोटरबाइक क्लब में एक भी महिला बाइकर नहीं है।
मैंने पति बृजेश यादव से बात की तो उन्होंने खुद बाइक चलाने की ट्रेनिंग दी। इसके बाद मैंने पूरे भारत का सफर अकेले ही बाइक पर तय किया। लद्दाख जैसे दुर्गम रास्तों पर भी बाइक चलाई। मेरी ख्वाहिश है कुछ ऐसा करने की, जो अन्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित करें।
सपनों को दे रही पंख
एक्टिवा ट्रेनर ज्योति ठाकुर ने बताया कि स्कूटर हो या बाइक दोनों ही मुझे आकर्षित करते थे। मेरे आत्मविश्वास को देखकर मेरी बहुत सी दोस्त, पड़ोस के लोगों ने मुझे स्कूटर चलाना सीखा। तभी मेरे मन में विचार आया क्यों न अन्य लड़कियों को भी इस काम में मदद करूं। इसी सोच के साथ करीब डेढ़ साल पहले आजादी की उड़ान की शुरुआत हुई। मैं 10 दिन में ही महिलाओं को एक्टिवा चलाना सिखा देती हूं। अपने जुनून को जीविका बना लिया।