अपनी चांदनी पर इतराने वाला चांद सजनी की चमक में खो गया है। लाल जोड़े और सोलह शृंगार में सजी सुहागिन के चेहरे से पिया की नजरें हटती नहीं। अर्धांगिनी चलनी से चांद को निहारती है। वह उससे सौगात मांगती है कि हर बार उसके जीवन में करवाचौथ की ये रात आए। चलनी साजन की तरफ मुड़ती है और दोनों की नेह भरी अंखियां बतियाने लगती हैं। इस उत्सव ने सात जनम के रिश्ते की मिठास और भी बढ़ा दी है।
कुछ ऐसा ही था शुक्रवार को करवाचौथ की रात का नजारा। पति की लंबी उम्र के लिए निर्जल व्रत रखने वाली सुहागिनों को चंद्र देव का इंतजार था। मनुहार कराने के बाद उनके दर्शन हुए तो पत्नियों के चेहरे पर रौनक आई। उन्होंने चंद्रमा को अर्घ्य देकर पति के हाथों जल पीया और अपना व्रत खोला। इससे पूर्व सभी ने सज धज कर शाम को करवाचौथ की कथा सुन पूजा अर्चना की। उसके बाद सास को बायना दिया। नव विवाहिता के मन में उमंग भी थी और घबराहट भी। अपनी सास के बताए अनुसार उसने चौथ माता की पूजा की।
सुबह से ही सुहागिन करवाचौथ की तैयारियों में व्यस्त थीं। शाम को सबने सामूहिक रूप से करवाचौथ का पूजन किया। मिट्टी, चीनी के करवे, दीपक, मिठाई, पूड़ी आदि सब थाल में सजाकर वीरावती की कहानी सुनी। उसके बाद सबने अपने करवे सात बार बदले और चौथ माता से अखंड सौभाग्य की कामना की। निर्जल व्रत की तपस्या करती सुहागिनों के चेहरों पर प्रेम और विश्वास दमक रहा था। दिन ढलते ही महिलाओं की निगाहें चांद को ढूंढने लगीं पर वो इंतजार करा रहा था। .... बजे चंद्रमा के दर्शन हुए। महिलाओं ने चंदा को चलनी में देखने के बाद अर्घ्य अर्पित किया और अखंड सौभाग्य की प्राप्ति का वर मांगा। पति ने पत्नी को उपहार देकर अपनी भावनाएं व्यक्त कीं।