फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

ग्राम नरौली के ग्रामीण स्वतंत्रता सेनानी का गांव होने पर करते हैं गौरव

विज्ञापन
विज्ञापन
कासगंज। किसरोली मार्ग पर बसा ग्राम नरोली अपने आगोश में आजादी के इतिहास को समेटे हुए है। इस गांव से पांच स्वतंत्रता सेनानियों ने एक साथ आजादी के आंदोलन में हिस्सा लिया। आजादी की खातिर जेेल की यातनाएं सही, लेकिन आज इन स्वतंत्रता सेनानियों के परिजन गुमनामी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
विज्ञापन

आजादी को पाने में जिले के स्वतंत्रता सेनानी भी पीछे नहीं रहे। आजादी के इन दीवानों ने न दिन देेेखा न रात। इनके मन में बस एक ही जज्बा था कि बस देश किसी तरह से अंग्रेजों की दास्ता से आजाद हो जाए। इसके लिए घर परिवार को भी छोड़ दिया। जेल जाने से भी वे पीछे नहीं हटे। ग्राम नरोली से देश की आजादी के लिए हिस्सा लेने वाले राम सिंह, रामलाल, उनके पुत्र नंद किशोर, लाल सिंह, टीकाराम ने देश की, आजादी की लड़ाई में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।
इनमें से लाल सिंह को छोड़कर शेष स्वतंत्रता सेनानियों की पीढ़ियां गांव में ही रहती है, लेकिन ये पीढ़ियां अब गुमनामी का जीवन व्यतीत कर रही हैं। सरकार के द्वारा तमाम योजनाएं संचालित की जा रहीं है, लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों की पीढ़ियों के हिस्से में कोई भी योजना नहीं आई है। खेती किसानी आदि के माध्यम से ही वे अपने परिवार का भरण पोषण कर रही है।
विज्ञापन

मुकुंदी ने बयां की आजादी की दास्तां
गांव निवासी 105 वर्षीय मुकुंदीलाल ने यादों को ताजा करते हुए बताया कि गांव में देश को आजाद करने का जज्बा था। ग्रामीण बरगद के पेड़ के नीचे एकत्रित होकर आंदोलन की रणनीति बनाते थे। उधर स्वतंत्रता सेनानी राम सिंह के पुत्र उमराव सिंह (82) बताते हैं कि उनके पिता के साथ गांव से लाल सिंह, रामलाल उनके बेटे नंद किशोर व टीकाराम ने भी आजादी की लड़ाई लड़ी। 26 जनवरी 1931 को कासगंज के गांधी मूर्ति से गिरफ्तारी हुई। 9 मार्च 1931 को जेल से पिता को रिहा किया गया। उनके पिता की मौत के बाद उनकी मां चंपा देवी को पेंशन मिलती थी, लेकिन अब किसी योजना का लाभ नहीं मिल रहा।
स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों को नहीं करता कोई याद
पूर्व प्रधान चतुर भारती बताते हैं कि देश की आजाद कराने में स्वतंत्रता सेनानियों के साथ ही ग्रामीण भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे। ग्रामीणों को गांव के स्वतंत्रता सेनानियों का गांव होने पर गर्व है, लेकिन समय के साथ इस गांव को भुला दिया गया है। स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को कोई भी सुविधा नहीं मिल पा रही। किसी परिजन को आयोजित होने वाले समारोहों में बुलाया भी नहीं जाता।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें