कई बार ऐसा होता है कि पार्टी अपने चुनाव चिह्न से हार रही होती है, वहीं जब चिह्न को बदलती है तो जीत हासिल करती है। इस वजह से कुछ पार्टियां खास चुनाव चिह्न को लकी मानती हैं। बीते चुनावों में कुछ लोग ऐसे भी थे जो पार्टी या कार्यकर्ता के आधार पर नहीं, बल्कि चुनाव चिह्न को देखकर वोट डालते थे।
जैसे, महावत समुदाय के लोग हाथी चिह्न को, वहीं मल्लाह समुदाय नाव को देखकर वोट डालते। अगर ये चिह्न वोट डालने के दौरान नहीं मिलते तो वे बिना मतदान के ही वापस लौट आते थे। ऐसे ही कुछ रोचक किस्सों में से एक किस्सा है 1957 के आम चुनाव का। पंजाब में एक उम्मीदवार ने अपना चुनाव चिह्न मुर्गा चुना था।
चुनाव से कुछ दिन पूर्व उसने अपने चुनाव चिह्न का प्रचार करने के लिए कई सौ मुर्गे क्षेत्र में छोड़ दिए। दुर्भाग्य ऐसा रहा की गीदड़ों का एक झुंड कहीं से आ निकला और कुछ मुर्गों का शिकार कर चलता बना। वहीं कुछ मुर्गे भाग निकले। इस पर मतदाताओं ने सवाल उठा दिया कि जो उम्मीदवार गीदड़ से अपने चुनाव चिह्न की रक्षा नहीं कर सकता, वह हमारी क्या रक्षा करेगा।
नाव नहीं तो वोट नहीं
दूसरा किस्सा काफी रोचक रहा जहां 1957 में हुए लोकसभा चुनाव के दौरान यूपी के एक मतदान केंद्र में कुछ मल्लाह वोट देने आए। उस केद्र पर सबसे आगे रहे एक मल्लाह मतदाता अंदर गए और बड़बड़ाते हुए जल्द ही निकल आए। पूछने पर यह मालूम हुआ कि वहां पर नाव चुनाव चिह्न है ही नहीं। इसके बाद तो सभी मल्लाह मतदाता मतदान केंद्र से बाहर चले गए। उन्होंने किसी को वोट नहीं डाला।