विद्यालय के कुल 26 दिव्यांग छात्र-छात्राएं परीक्षा में शामिल हुए, जिनमें 9 ने प्रथम और 15 ने द्वितीय श्रेणी में सफलता हासिल की। हालांकि दो छात्र असफल रहे, लेकिन अधिकांश छात्रों का प्रदर्शन उम्मीद से कहीं बेहतर रहा। इन छात्रों की राह आसान नहीं थी। सुन और बोल नहीं पाने की चुनौती के साथ-साथ आर्थिक तंगी भी बाधा थी, लेकिन इशारों की भाषा को अपना माध्यम बनाकर उन्होंने सफलता की नई इबारत लिख दी।
विद्यालय की शिक्षिका पल्लवी तिवारी ने बताया कि इन बच्चों में सीखने की ललक मजबूत होती है। ये बौद्धिक रूप से काफी मजबूत होते हैं। बस सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है। प्रधानाचार्या ममता सिंह ने इस सफलता का श्रेय छात्रों की मेहनत और उनके हौसले को दिया। उन्होंने कहा कि ये बच्चे हर दिन हमें सिखाते हैं कि जिंदगी में सबसे बड़ी ताकत आत्मविश्वास है।
संघर्ष के साथ प्रिंस ने पाया तीसरा स्थान
प्रिंस कुमार ने 63.8% अंक हासिल कर विद्यालय में तीसरा स्थान प्राप्त किया। पिता ज्ञानचंद ने बताया कि प्रिंस शुरू से ही पढ़ाई में रुचि रखते हैं और लगातार प्रयास करते हैं। बोलने और सुनने में असमर्थ होने के बावजूद प्रिंस ने लिखकर और अभ्यास के जरिए परीक्षा की तैयारी की। उन्हें चित्रकारी में विशेष रुचि है और इस प्रतिभा के लिए उन्हें बुलंदशहर के जिलाधिकारी ने सम्मानित भी किया था। आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें लखनऊ भेजेंगे।