रंग-बिरंगी रोशनी, झूलों पर मस्ती करते बच्चे, दुकानों पर खरीदारी करते लोग और अखंड सौभाग्यवती के लिए शिव-पार्वती की पूजा करतीं महिलाएं। कुछ ऐसा दृश्य सोमवार को गणगौर मेले में दिखा। चौराहों और मंदिरों के बाहर विराजमान शृंगारित गणगौर जोड़ों को देखने के लिए श्रद्धालु उमड़ पड़े।
चैत्र नवरात्र की द्वितीया से दो दिवसीय गणगौर मेला का शुभारंभ पारंपरिक रीति के साथ किया गया। गणगौर मेले में गोकुलपुरा और मोती कटरा रंग-बिरंगी रोशनी से जगमग दिखा। चौराहों और मंदिरों के बाहर मनमोहक गणगौर जोड़ों के दर्शन के लिए श्रद्धालु आतुर दिखे। गोकुलपुरा में गणगौर के तीन दर्जन से अधिक जोड़े सजाए गए हैं, जिनकी रात में शोभायात्राएं निकाली गईं।
मेले का शुभारंभ एमएलसी विजय शिवहरे, मुख्य संरक्षक दिनेश चंद्र शर्मा, दाउदयाल शर्मा, रजत अस्थाना और केके शिवहरे ने दीप जलाकर किया। अध्यक्ष रामकुमार कसेरा ने बताया कि अशोक नगर, गोकुलपुरा, राजामंडी, कंसगेट, बल्का बस्ती, मंसा देवी आदि मेला क्षेत्र में लगभग 250 स्टाल लगे हुए हैं।
चौराहों और मंदिरों के बाहर गणगौर के शृंगारित जोड़े विराजमान हैं। कुल 32 ईसर और गौरा के जोड़ों को ढोल नगाड़ों संग हटकेश्वर मंदिर पर जल ग्रहण के लिए ले जाया गया। जहां भजन संध्या सहित सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुए। मिताई गौर मंडल के गायकों ने माहौल को भक्तिमय कर दिया।
नरेंद्र वर्मा और भरत वर्मा ने बताया कि कमेटी ने मेले की व्यवस्था संभालने के लिए स्वयंसेवकों की टीम लगाई है। इस मौके पर अमन वर्मा, ललित शर्मा, प्रदीप गुप्ता, गौरव वर्मा, गिरीश वर्मा, अभिषेक जैन और पंकज यादव आदि ने मेले की व्यवस्थाएं संभालीं।
गणगौर मेले का ऐतिहासिक महत्व
विष्णु पोरवाल और गोविंद वर्मा ने बताया कि गणगौर त्योहार शिव और पार्वती के पुनर्मिलन और देवी पार्वती की सौभाग्य की कामना से जुड़ा है। मान्यता है कि मां पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी इस भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें वरदान दिया और तभी से यह पर्व सौभाग्य और सुख-समृद्धि का प्रतीक बन गया है।