उत्तर प्रदेश में ट्रेनों की सुरक्षा के नाम पर पिछले 29 साल से दिखावा किया जा रहा है। वर्ष 1990 के बाद से जीआरपी में पुलिस बल की बढ़ोत्तरी नहीं हो सकी है। उस वक्त भी 4000 लोग थे आज भी उतने ही पद हैं। जबकि इस बीच 500 से ज्यादा नई ट्रेन आ गईं। 298 नए स्टेशन खुल गए।
311 ऐसे आउटर बन गए जहां घटनाएं होने का अंदेशा लगा रहता है। 150 नई पुलिस चौकियां खुलनी थीं जो नहीं बन पा रही हैं। हालात यह हैं कि सैकड़ों ट्रेनें ऐसी हैं जिनमें एक सिपाही तक की तैनाती नहीं है।
निजामुद्दीन तिरुवनंतपुरम सेंट्रल सुपर फास्ट एक्सप्रेस में लूटपाट के दौरान मां-बेटी की मौत के बाद रेलवे ने सभी ट्रेनों की सुरक्षा की समीक्षा शुरू कर दी है। मथुरा से अलवर, कासगंज, अछनेरा, भरतपुर, आगरा और दिल्ली रेल मार्ग पर चलने वाली सभी 185 ट्रेनों की रिपोर्ट तैयार की जा रही है।
इस दौरान जो चौंकाने वाली बात निकलकर सामने आ रही है उसके मुताबिक 1990 के बाद ट्रेन और पैसेंजरों की सुरक्षा के लिए गठित जीआरपी में स्टाफ नहीं बढ़ाया गया है। जबकि नई ट्रेन आ गईं। प्लेटफार्म बन गए। स्टेशन तैयार हो गए।
प्रदेश सरकार से मांगे 5000 सिपाही
आईजी रेलवे भजनीराम मीणा ने स्वीकार किया कि स्टाफ की बेहद कमी है। जीआरपी कर्मियों की कमी के कारण ट्रेनों में सुरक्षा नहीं हो पा रही है। उन्होंने बताया कि प्रदेश सरकार से 5000 सिपाही मांगे गए हैं। अगर इतने लोग मिल जाते हैं तो नई चौकी और थाने खोले जाएंगे। हर ट्रेन को हम लोग सुरक्षा मुहैया करा सकते हैं।
मथुरा जीआरपी में चाहिए 180, स्टाफ है 80 का
मथुरा जीआरपी थाने पर 180 का स्टाफ होना चाहिए लेकिन यहां केवल 80 लोग कार्य कर रहे हैं। यह स्थिति केवल मथुरा थाने की ही नहीं बल्कि आगरा, कासगंज, अलीगढ़, हाथरस, एटा, मैनपुरी, इटावा, कानपुर, इलाहाबाद और मिर्जापुर के जीआरपी थानों में भी पचास से चालीस फीसदी तक पद रिक्त पड़े हैं।
1990 में उत्तर प्रदेश में जीआरपी में 4000 पद थे आज भी वहीं हैं। नियमानुसार हर ट्रेन में जीआरपी के दो सिपाहियों की तैनाती होनी चाहिए। लेकिन स्टाफ की कमी के कारण कहीं तैनाती नहीं हो पा रही है।
न ट्रेन चेक हो रहीं न ही प्लेटफार्म
नियम तो यह है कि रेलवे स्टेशन पर आने वाली ट्रेन को चेक किया जाए। जीआरपी और आरपीएफ के सिपाही ट्रेन में चढ़कर बाकायदा टार्च मारकर चेक करें। लेकिन ऐसा हो ही नहीं पा रहा है। एक दो सिपाही होते हैं वह भी प्लेटफार्म पर खड़े-खड़े ही ट्रेन की खिड़की से टार्च मार देते हैं।