दुनिया के सातवें अजूबे और मोहब्बत की निशानी ताजमहल की छाया में मुगलिया शहर के सौ से ज्यादा स्मारक ऐसे हैं, जो पर्यटकों की निगाह से दूर हैं। यदि इनका भी प्रचार हो तो वह मुगलिया शहर और इसके इतिहास से रूबरू कराने के साथ आगरा को तीन से पांच दिन का पर्यटन केंद्र बना सकती हैं। आइए, एक नजर डालते हैं इन स्मारकों पर...
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एेतिहासिक स्थ्ल
- फोटो : अमर उजाला
अकबर के मकबरे से सटा कांच महल को मुगल बादशाह जहांगीर की शिकारगाह के रूप में मान्यता दी गई है। 1605 से 1619 के बीच निर्मित कांच महल का शिकार के दौरान मुगल बादशाह उपयोग किया करते थे। फतेहपुर सीकरी के टर्की सुल्ताना के महल की तरह ही कांच महल में बेहद सुंदर कार्विंग और मोजेक का प्रयोग किया गया है।
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- फोटो : अमर उजाला
यमुना नदी के पूर्वी किनारे पर रामबाग और एत्माद्दौला के बीच में बना चीनी का रोजा है। यहां तक पहुंचना वैसे मुश्किल है। छोटी सी गली और आगे कच्चा रास्ता, लेकिन मुगलिया दौर की यह इमारत लोगों को अपनी ओर खींचती है। मुगल शहंशाह शाहजहां के प्रधानमंत्री मौलाना शुक्रुल्लाह शिराजी ने 1639 में यह मकबरा बनवाया था।
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लाल ताजमहल को अंग्रेज सैन्य अफसर कर्नल जॉन विलियम हेसिंग की पत्नी एन हेसिंग ने बनवाया था। 1803 में डच कंपनी के अधिकारी की मौत के बाद इसका निर्माण कराया गया। हेसिंग हॉलैंड से 1752 में सीलोन में सैन्य सेवा में आए थे। भगवान टाकीज चौराहे पर एमजी रोड की ओर इस मकबरे के पास कई अंग्रेज अफसरों की कब्रें हैं।
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दिल्ली हाईवे पर लाल पत्थर से बने सलावत खां मकबरे को 64 खंभे के नाम से भी जानते हैं। 1566 से 1568 के बीच मकबरा निर्मित हुआ है। सलावत खां शाहजहां के बख्शी थे, जिनका कत्ल अमर सिंह राठौर ने आगरा के किले में कर दिया था। यह नगर चैन का एक हिस्सा था और इसके चारों ओर बड़े बाग थे, जो यमुना नदी के किनारे तक बने हुए थे।
दिल्ली हाईवे पर अकबर के मकबरे से आगे बांई ओर मरियम जमानी का मकबरा है। लाल पत्थरों से बना यह मकबरा पर्यटकों का आकर्षण नहीं बन सका। जहांगीर की मां और अकबर की पत्नी मरियम जमानी का यह मकबरा मूल रूप से 1495 में सिकंदर लोदी के दौर में बारादरी था, जिसे 1623 में मकबरे में तब्दील किया गया।