विश्वविद्यालय की कालेज डेवलेपमेंट काउंसिल के निदेशक डा. विपिन अग्रवाल ने सुझाव दिया कि कॉपी जंचने के बाद के नंबरों को सुरक्षित किया जाए। अब तीन साल बाद कॉपी नष्ट हो जाती है, इसलिए चार्ट में दर्ज नंबरों को सत्य मानना भी मजबूरी है। अभी तक 50 कॉपियों को चेकिंग के बाद एक कवर में रखा जाता है। इस कवर पर 50 कॉपियों में रोल नंबर के मुताबिक नंबर अंकित होते हैं। इस कवर पर परीक्षक और कोआर्डिनेटर के हस्ताक्षर भी होते हैं। कानपुर और लखनऊ विश्वविद्यालय की तर्ज पर अब इस कवर को स्केन किया जाए और इंटरनेट पर अपने सर्वर में अपलोड कर लिया जाए। ऐसे कवर की मदद से आटोमेटिक चार्ट तैयार हो सकेगा, जिसमें फर्जीवाड़ा करना मुमकिन नहीं होगा। इस बारे में उन्होंने केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री डा. रामशंकर कठेरिया को भी बताया है।