आगरा। वृद्धाश्रम की खामोश दीवारों में रह रहीं मां के दिल में आज भी अपने बेटों के वापस आने की उम्मीद जिंदा है। इसी भरोसे की वजह से बेटों से तिरस्कार झेलने के बाद भी उनकी ममता बरकरार है। वह न तो बेटे को भूल रहीं और न ही उनके खिलाफ जुबां पर कड़वे शब्द ही लाती हैं। जब भी कोई आश्रम में आता है तो उनकी नजरें उसमें अपने बेटे की झलक निहारतीं और फिर मायूस हो जाती हैं।
बेटे आएंगे, वापस ले जाएंगे
कमला नगर क्षेत्र की विद्या देवी (90 वर्षीय) कहती हैं कि पति की शहर में फैक्टरी थी। 4 बेटे और बहू हैं। पति के दिवंगत होने के बाद बच्चों ने फैक्टरी और घर बेच दिया। हिस्सा बांट हुआ तो सभी ने अलग-अलग फैक्टरी खोल लीं। एक मां को कोई साथ रखने को तैयार नहीं था। वह वृद्धाश्रम में रहने लगीं। कभी नहीं सोचा था, ऐसा होगा। मगर, आज भी बेटों के लिए उनके दिल में ममता है, आस है कि एक दिन बेटे आएंगे और वापस ले जाएंगे।
बेटा तो अपना ही होता है कभी आएगा
फतेहपुर सीकरी निवासी सीमा मंगल (70 वर्षीय) कहती हैं कि 15 वर्ष पहले पति के निधन हुआ था। इसके बाद दो बेटा और बहू के साथ रहने लगीं। बहू ने घर में नहीं रहने दिया, उसे दुर्गन्ध आती थी। मारपीट, गालियां देना, खाना न खिलाना जैसे बर्ताव से जीवन की आस ही टूट गई थी। पड़ोसियों ने वृद्धाश्रम पहुंचाया। मगर, वह कहती हैं कि बेटा तो अपना ही होता है, कभी तो वह आएगा ही।
गले लगाएगा और कहेगा मां घर चलो
नोएडा की रहने वाली शांति देवी (75 वर्षीय) के पति रोशनलाल की 10 वर्ष पहले मृत्यु हो गई थी। इसके बाद दो बेटों के साथ रहने लगीं लेकिन बहू ताना देती थी। बेटों ने भी मुंह मोड़ लिया। बीमार होने पर बहू और बेटे इलाज नहीं कराते थे लेकिन मां होने के कारण हर बार माफ करती रही। अब जब वृद्धाश्रम में रह रही तब भी बेटे की याद आती है कि वो जरूर आएगा, गले लगाकर कहेगा मां घर वापस चलो।