आगरा। खंदौली चौराहे पर करीब 18 साल पहले हुई युवक याजवेंद्र की गोली मारकर सनसनीखेज हत्या के मामले में एडीजे-5 विराट कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में बड़ा फैसला सुनाया। अभियोजन पक्ष के तीनों प्रमुख गवाहों के अपने बयानों से पलट जाने से मुख्य आरोपी रिंकू उर्फ पुनीत और उसकी मां विपन देवी को अदालत ने दोषमुक्त कर दिया। हत्या की बात सच होने के बाद भी कातिल बेनकाब न होने से मामला सुर्खियों में है।
जब चौराहे पर थम गई थीं सांसें
घटना 15 जुलाई 2008 की शाम की है। हाथरस जिले के गांव सरौठ निवासी प्रदीप उर्फ पप्पू अपने छोटे भाई याजवेंद्र सिंह, मलखान सिंह और योगेंद्र के साथ गाड़ी से घर लौट रहे थे। अभियोजन पक्ष के अनुसार, जैसे ही उनकी गाड़ी खंदौली चौराहे से मई रोड पर मुड़ी, एक कार ने आगे आकर रास्ता रोक लिया। उस कार में विजय सिंह और उसकी पत्नी विपन देवी सवार थे। इसी दौरान घात लगाए बैठे विजय सिंह के बेटे रिंकू उर्फ पुनीत और भोला उर्फ विनोद बाइक से आ धमके। आरोप था कि विपन और विजय सिंह के इशारे पर रिंकू ने याजवेंद्र को दबोच लिया और भोला ने सिर में गोली मार दी। अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।
कानूनी दांवपेंच में आए कई मोड़
इस लंबी कानूनी लड़ाई में मुकदमे की तस्वीर कई बार बदली। सुनवाई के दौरान मुख्य आरोपी विजय सिंह की मौत होने से उसके खिलाफ कार्यवाही खत्म हो गई। दूसरे आरोपी भोला उर्फ विनोद की फाइल 2018 में अलग कर दी गई। इसके बाद अदालत में सिर्फ रिंकू और विपन देवी के खिलाफ ही सुनवाई जारी रही। मुकदमे का सबसे बड़ा मोड़ तब आया, जब अदालत में मुख्य गवाह पेश हुए। वादी प्रदीप कुमार, योगेंद्र सिंह और मलखान सिंह शुरुआती बयानों में पुलिस की कहानी के साथ थे लेकिन अदालत की जिरह के दौरान उनके बयान बदल गए।
ये दिए बयान
प्रदीप कुमार- स्वीकार किया कि उसने असल में गोली चलाते किसी को नहीं देखा। उसने रिंकू के याजवेंद्र को पकड़ने और भोला के गोली मारने की बात से भी साफ इन्कार कर दिया।
योगेंद्र सिंह- गवाही दी कि घटना के वक्त वह गाड़ी की पिछली सीट पर लेटा था, इसलिए आगे क्या हुआ उसे कुछ दिखाई नहीं दिया।
मलखान सिंह- वह यह देख नहीं पाया था कि गोली किसने चलाई और उसने आरोपियों को मौके पर देखा भी नहीं था।
भूमिका नहीं हो सकी साबित
अदालत ने पोस्टमार्टम और मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर माना कि याजवेंद्र की मौत गोली लगने से हुई थी। हालांकि, स्पष्ट किया कि किसी की हत्या होना और किसी खास शख्स पर उसका दोष साबित होना, दोनों अलग बातें हैं। जब तीनों प्रमुख गवाह अपने बयानों से पलट गए तो साक्ष्य के अभाव में आरोपियों की संलिप्तता साबित नहीं हो सकी। जिन चश्मदीदों के बयानों पर पुलिस ने चार्जशीट तैयार की थी, वे बिखर गए।