मैनपुरी। जिले में साल दर साल थैलेसीमिया के मरीजों की संख्या बढ़ती जा रही है। उपचार के नाम पर जिले में मात्र डायलिसिस की व्यवस्था है। बेहतर उपचार के लिए मरीजों को सैफई, दिल्ली और लखनऊ जाना पड़ रहा है। स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट के अनुसार जिले में 12 से 18 मरीज हर साल बढ़ रहे हैं।
लाइलाज बीमारी थैलेसीमिया में हीमोग्लोबिन बनने की प्रक्रिया गड़बड़ाने लगती है। थैलेसीमिया पीड़ित मरीज के शरीर में खून की भारी कमी हो जाने से उसे बार-बार खून चढ़ाना पड़ता है। इलाज में थोड़ी सी भी देरी बच्चे को मौत के मुहाने तक पहुंचा देती है। जनपद में हर साल एक से डेढ़ दर्जन थैलेसीमिया के नए मरीज मिलते हैं। जिला अस्पताल में संचालित डायलिसिस यूनिट में वर्तमान में 70 मरीज डायलिसिस का लाभ ले रहे हैं। जिसमें 20 मरीज थैलेसीमिया के हैं। यूनिट प्रभारी सत्यम ने बताया कि यहां आने वाले मरीजों को डायलिसिस का लाभ दिया जा रहा है। यहां डायलिसिस का उपचार लेने वाले मरीज सैफई और दिल्ली तथा लखनऊ से उपचार ले रहे हैं।
वरिष्ठ फिजीशियन डॉॅ. जेजे राम बताते हैं कि हीमोग्लोबिन अल्फाग्लोबिन और बीटाग्लोबिन प्रोटीन से बनता है और थैलेसीमिया इस प्रोटीन में ग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में खराबी होने से होता है। इससे लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से नष्ट हो जाती हैं। रक्त की भारी कमी के कारण रोगी के शरीर में बार-बार रक्त चढ़ाना पड़ता है। रक्त की कमी से हीमोग्लोबिन नहीं बन पाता है। माता-पिता दोनों के जींस में थैलेसीमिया होने से बच्चे को होने वाला रोग मेजर थैलेसीमिया होता है। वहीं, थैलेसीमिया माइनर उन बच्चों को होता है, जिन्हें प्रभावित जीन माता-पिता में से किन्हीं एक में होता है। उनका कहना था कि थैलेसीमिया के हर साल 12 से 18 नए मरीज मिल जाते हैं। ऐसे मरीजों को ब्लड बैंक से बिना डोनर के साल में कई बार रक्त चढ़ाया जाता है।
लक्षण नजर आएं तो तुरंत लें डॉक्टर की सलाह
माता-पिता को यदि अपने बच्चे में थैलेसीमिया के लक्षण नजर आएं, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार पूर्ण रक्त कण गणना, कंप्लीट ब्लड काउंट यानी सीबीसी से रक्ताल्पता या एनीमिया का पता लगाया जाता है। वहीं, हीमोग्लोबिन इलेक्ट्रोफोरेसिस से असामान्य हीमोग्लोबिन का पता लगता है। इसके अलावा म्यूटेशन एनालिसिस टेस्ट, एमटी द्वारा एल्फा थैलेसीमिया की जांच के बारे में जाता जा सकता है। मेरुरज्जा ट्रांसप्लांट से भी इस बीमारी के उपचार में मदद मिलती है।
बचाव के उपाय
- विवाह से पहले महिला-पुरुष रक्त जांच कराएं।
- गर्भावस्था के दौरान इसकी जांच कराएं।
- रोगी की हीमोग्लोबिन 11 या 12 बनाए रखने की कोशिश करें
- समय पर दवाइयां लें और इलाज पूरा कराएं।