सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई हाईकोर्ट की ओर से पहले से जारी दिशा-निर्देशों को आदर्श मानते हुए राज्यों को अपनाने को कहा। न्यायालय का मत था कि जब फुटपाथ नहीं होते, तो गरीब, बुजुर्ग, बच्चे और दिव्यांगजन मजबूर होकर सड़क पर चलते हैं। हादसों का शिकार हो जाते हैं। यह केवल यातायात का मुद्दा नहीं, यह जीवन का अधिकार है। यह निर्णय उन लाखों भारतीयों के लिए एक उम्मीद की किरण है, जो आज भी फुटपाथ के अभाव में जान जोखिम में डालकर सड़क पर चलते हैं। अब हर कदम सुरक्षित होगा, हर जीवन की अहमियत होगी।
युवा उद्यमी और सामाजिक कार्यकर्ता हेमंत जैन ने इस मामले में याचिका दाखिल की। पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट में उनकी ओर से बहस वरिष्ठ अधिवक्ता केसी जैन ने की। जिसमें देशभर में फुटपाथों की दुर्दशा, अतिक्रमण और दिव्यांगों के लिए उनकी अनुपलब्धता की ओर ध्यान दिलाया गया था। याचिका में बताया गया कि वर्ष 2022 में 77,004 पैदल यात्रियों के साथ दुर्घटनाएं हुईं, जिनमें से 32,797 की मृत्यु हुई, 34,055 गंभीर रूप से घायल हुए, 30,809 को मामूली चोटें आईं।
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चुप्पी को मिली सांवैधानिक आवाज
यह सिर्फ एक याचिका नहीं थी, यह उन करोड़ों पैदल चलने वालों की आवाज थी, जिन्हें कभी सुना नहीं गया। मैंने यह दर्द नजदीक से देखा है। यह फैसला उन सभी के नाम है, जिन्होंने चुपचाप हादसों को सहा, और अब उनकी चुप्पी को एक सांवैधानिक आवाज मिल गई है। - हेमंत जैन, याची
याचिका में दिए तथ्य व आंकड़ेः
वर्ष कुल सड़क हादसों में मृतक पैदल यात्री मृतक प्रतिशत
2016 1,50,785 15,746 10.44 प्रतिशत
2017 1,47,913 20,457 13.83 प्रतिशत
2018 1,51,417 22,656 14.96 प्रतिशत
2019 1,51,113 25,858 17.11 प्रतिशत
2020 1,31,714 23,483 17.83 प्रतिशत
2021 1,53,972 29,124 18.9 प्रतिशत
2022 1,68,491 32,825 19.5 प्रतिशत