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UP: निसंतान दंपती ने जिस बेटे को लिया गोद, उसने बुढ़ापे में आकर ये क्या किया; बुजर्ग मां-बाप का दर्द रुला देगा

Sat, 18 Oct 2025 08:41 AM IST
धीरेन्द्र सिंह दुर्गेश चाहर, संवाद न्यूज एजेंसी, आगरा

सार

निसंतान दंपती ने जिस बेटे को गोद लिया, वो बुढ़ापे में उनका सहारा नहीं बना। अब उसने ही बुजुर्ग मां-बाप को घर से निकाल दिया। अब दंपती वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। 
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बुजुर्ग माता-पिता - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
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विस्तार
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भगवान ऐसे दिन किसी को न दिखाए। जिस बेटे को आंखों का तारा बनाकर रखा, बुढ़ापे में उसी ने बेघर कर दिया। अब न तो बेटा हमारा रहा और न ही घर। जिक्र आते ही दिल का गुबार आंखों से आंसू बनकर बरसने लगा। रामलाल वृद्धाश्रम में रहने वाले ज्यादातर बुजुर्ग अभिभावक ऐसे हैं जिन्हें बेटों ने ही इस हाल पर ला छोड़ा है।
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सिकंदरा स्थित रामलाल वृद्धाश्रम में वर्तमान में 350 से अधिक बुजुर्ग रह रहे हैं, इनमें 16 दंपती हैं। यहां रह रहे सिकंदरा के 70 वर्षीय राजेश अग्रवाल और उनकी 60 वर्षीय पत्नी गीता रानी ने बताया कि उनके कोई संतान नहीं थी। खुद का काराेबार था। बुढ़ापे की लाठी बन सके इसलिए एक बेटा गोद लिया। उसको पढ़ाया लिखाया, काबिल बनाया।

 

पौत्र को प्रतिष्ठित स्कूल में प्रवेश दिलाने के लिए डेढ़ लाख रुपये दिए। दो साल पहले अच्छा मकान खरीदने के बहाने बेटे ने उनका घर 46 लाख रुपये में बिकवा दिया। इसके बाद सारे रुपये लेकर ससुराल चला गया। वहां अपना काराेबार कर रहा है। पांच महीने पहले उन्हें सड़क पर छोड़ गया। तब से वो आश्रम में ही रह रहे हैं।

 

राजेश की तरह ही बेलनगंज के सीमेंट व्यापारी श्यामलाल खंडेलवाल भी अपनी पत्नी शकुंतला के साथ आश्रम में रहते हैं। बताते हैं कि उम्र ढली तो वह कामकाज देखने में असमर्थ हो गए। बेटा दो-दो दिन तक भूखा-प्यासा रखता था। रोने पर आंसू पोछने के बजाय घर से धक्का देकर बाहर कर दिया। घर का भी कुछ पता नहीं क्या किया। ठोकर खाते हुए किसी तरह आश्रम पहुंचे। 9 महीने से आश्रम में ही रह रहे हैं। बेटी हालचाल लेने आ जाती है पर बेटे को कभी उनकी याद नहीं आई।

 
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इन दोनों दंपती की तरह मदिया कटरा के छोटेलाल, कमला नगर के रमेशचंद गर्ग, हाथरस के महेंद्र शर्मा, मंडी समिति के ओमकार और अन्य बुजुर्गों की आंखों में परिवार के बारे में पूछने पर आंसू आ गए। कहने लगे कि जब बच्चे छोटे थे तो दिवाली आते ही खुश हो जाते थे। पटाखे खरीदने के लिए रुपयों की मांग करते थे। जेब में रुपये नहीं होने पर भी उनकी मांग पूरी करते थे। बुढ़ापे में हमें धक्का देकर बाहर निकाल दिया। यहां रहने वाले बुजुर्गों का कहना है कि घर की याद तो आती है पर इधर-उधर भटकने से अच्छा है हम यहीं सबके साथ दिवाली मनाए। अब तो आश्रम ही हमारा घर और यहां रहने वाले ही हमारा परिवार है।
 
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