श्री दाऊजी महाराज की भव्य छवि गद्दल धारण किए हुए
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मथुरा के बलदेव में श्री दाऊजी महाराज का 443वां प्राकट्योत्सव 26 दिसंबर यानि आज धूमधाम से मनाया जाएगा। सुबह से शाम तक विभिन्न आयोजन होंगे। श्रीदाऊजी महाराज को विशेष रजाई धारण कराई जाएगी। रजाई गददल धारण कर दाऊजी भक्तों को सर्दी से बचाव का संदेश देते हैं। सुबह शहनाई वादन के साथ बलभद्र सहस्त्रनाम पाठ और हवन यज्ञ होगा। पंचामृत में केसर मिलाकर स्नान अभिषेक के साथ गर्म वस्त्र धारण होंगे । रजाई गददल धरण होगी। इसलिए इसे गददल पूर्णिमा कहते हैं। दोपहर में मेवा युक्त खीर और रात को गर्म मेवा युक्त दूध का भोग लगेगा। सर्दी में मेवा काजू, पिस्ता, केसर की मात्रा बढ़ा दी जाएगी।
मेला होगा शुरू
श्रीदाऊजी महाराज का 443 वां पाटोउत्सव प्राकट्य उत्सव के साथ मेला का शुभारंभ होगा। ये मेला श्री दाऊजी महाराज के प्राकट्य से जुड़ा हुआ है। मेला मार्गशीर्ष शुक्ल पूर्णिमा से शुरू होता है। इसी दिन 443 वर्ष पूर्व श्री बलदेव जी श्री रेवती मैया का प्राकट्य मार्गशीर्ष शुक्ल 15 संवत 1638 ईसवी सन 1582 को हुआ था, उस समय श्रीमद् वल्लभाचार्य महाप्रभु के पौत्र गोस्वामी गोकुलनाथ ने पर्णकुटी में उक्त विशाल प्रतिमा श्री विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा की। एक वर्ष बाद नये मंदिर में संवत 1639 सन् 1583 को श्री बलदेव जी रेवती मैया की प्राण प्रतिष्ठा की। पूजा व्यवस्था श्री गोस्वामी कल्याण देव जी को सौंपा। उनके वंशज आज भी व्यवस्था को निर्वहन कर रहे हैं। नया विशाल मंदिर का निर्माण दिल्ली के श्यामलाल सेठ ने कराया था, तभी से मेला प्राकट्य उत्सव से जुड़ा होने के कारण प्रतिवर्ष लगता है। मेले में लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं। मेला लक्खी मेला के रूप में प्रसिद्ध है।
प्राचीन विग्रह है श्री दाऊजी महाराज का
श्री दाऊजी महाराज का श्री विग्रह पुरातत्व विद्वानों के अनुसार ब्रज के सभी मंदिरों में प्राचीन हैं, जो कुषाण कालीन है। श्री बलदेव जी का आठ फुट ऊंचा और साढे तीन फुट चौड़ा श्री विग्रह है। पूरे ब्रज में ऐसा विशाल विग्रह देखने को नहीं मिलता है। श्रीबलदेव जी के पीछे शेषनाग सात फनों से युक्त हैं। मुख्य मूर्ति की छाया कर रहे हैं। जो साक्षात रुप में विष्णु भगवान शेषनाग है। बलदेवजी के सामने उनकी सहधर्मिणी रेवती मैया का विग्रह सुंदर मनोहारी भाव में है। पहले दिन भोग प्रसाद में मेवा युक्त खीर का भोग लगाया जाएगा, तभी से प्रतिदिन दोपहर में राज भोग में मेवा मिश्रित खीर का भोग लगता है।
दाऊ बाबा और मैया की रजाई विशेष है
सर्दी में दाऊ बाबा की विशेष रजाई व कोट के संबंध में पुजारी रामनिवास शर्मा ने बताया सर्दी से बचाव के लिए दाऊ बाबा और रेवती मैया की रजाई जिसे गददल कहते हैं। इसमें 75 मीटर कपड़ा गर्म और 12 किलो रुई भरी जाती है । शेष अवतार को सर्दी न लगे इसलिए दाऊ बाबा के कोट में 56 मीटर कपड़ा आठ किलो रूई भरी जाती है। रेवती मैया का सर्दी से बचाव को विशेष इंतजाम होता है।