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तर्पण और जलदान कर पितरों का किया भावपूर्ण स्मरण

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कासगंज के सोरों में हरि की पौड़ी घाट पर पितरों का तर्पण करते लोग - फोटो : KASGANJ
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सोरों(कासगंज)। मोक्षस्थली मानी जाने वाली तीर्थनगरी मे पितृपक्ष पर पितरों को जलदान करने का सिलसिला दूसरे दिन प्रतिपदा के श्राद्ध पर भी बना रहा। बड़ी संख्या में राजस्थान, एमपी, गुजरात, महाराष्टृ के अलावा जनपद के श्रद्धालुु बडी संख्या में अपने पितरों का स्मरण कर जलदान व तर्पण करने हरि की पौड़ी घाट पर पहुुंचे।
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प्रतिपदा का श्राद्ध होने के कारण इस तिथि को दिवंगत हुए प्रियजनों का श्रद्धालुओं ने भावपूर्ण स्मरण किया तथा अपने तीर्थपुरोहितों से उनके मोक्ष की कामना के लिए विधिविधानपूर्वक पूजन कराने के बाद तर्पण व जलदान किया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुु वराह घाट व लक्ष्मणजी वाले घाट पर तर्पण करने पहुुंचे। सुुबह से तर्पण का शुरू हआ सिलसिला दोपहर बाद तक अनवरत चलता रहा। शास्त्रधर्म के अनुसार श्राद्ध का पितरों के साथ अटूट संबंध है बिना पितरों के श्राद्ध की कल्पना नहीं की जा सकती। श्राद्ध पितरों को आहार पहुंचाने का माध्यम मात्र है। दिवंगत व्यक्ति के लिए जो श्रद्धा युक्त होकर जो तर्पण, पिंड दान आदि किया जाता है उसे श्राद्ध कहा जाता हैं।
श्राद्ध के देवता हैं वसु रुद्र और आदित्य
पंडित हेमंत त्रिगुणायत ने बताया कि श्राद्ध करते वक्त संकल्प व्यक्त किया जाता है कि मेरे वो पितर जो प्रेतरूप हैं, तिलयुक्त जौ के पिंडों से तृप्त हों। साथ ही सृष्टि में हर वस्तु ब्रहमा से लेकर तिनके तक चर हो या अचर हो मेरे द्वारा दिये जल से तृप्त हों। वसु, रूद्र और आदित्य श्राद्ध के देवता माने गए हैं। पंडित ओमप्रकाश पंडा ने बताया कि हर व्यक्ति के तीन पूर्वज पिता, दादा और परदादा क्रम से वसु, रूद्र और आदित्य के समान माने जाते हैं। श्राद्ध के वक्त वे ही अन्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। वे श्राद्ध कराने वालों के शरीर में प्रवेश करके और ठीक ढंग से रीति रिवाजों के अनुसार कराए गए श्राद्ध कर्म से तृप्त होकर वे अपने वंशधर को सपरिवार सुख समृद्धि व स्वास्थ्य का आशीर्वाद देते हैं।
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