आगरा में होती थी बर्फ की खेती, अंग्रेज ताजमहल पर करते थे चाय पार्टी
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ताजनगरी में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान बर्फ की खेती होती थी। यह बात आज सुनने में अजीब लगेगी लेकिन सच है। 19वीं सदी की प्रसिद्ध ब्रिटिश लेखिका फैनी पार्क्स ने 1850 में लिखी अपनी किताब वंडरिंग्स ऑफ अ पिलग्रिम इन सर्च ऑफ द पिक्चरेस्क में इस बात का जिक्र किया है। तब रेफ्रिजरेटर का आविष्कार नहीं हुआ था। ब्रिटिश अधिकारी आगरा की कड़कड़ाती सर्दियों का इस्तेमाल बर्फ उगाने के लिए करते थे।
खुले मैदानों में पुआल की मोटी परत बिछाकर उस पर मिट्टी के हजारों छोटे और उथले प्यालों (कुल्हड़ों) में पानी भरकर रखा जाता था। रात की तेज ठंडी हवा और वाष्पीकरण के कारण सुबह तक इन प्यालों में बर्फ जम जाती थी। भोर होने से पहले हजारों मजदूर इस बर्फ को इकट्ठा कर जमीन के अंदर बने गहरे और ठंडे गड्ढों में सुरक्षित रख देते थे ताकि भयंकर गर्मी में बर्फ का इस्तेमाल किया जा सके।
फैनी पार्क्स ने अपनी किताब में आगरा में ब्रिटिश अधिकारियों के रवैये का एक और अजीबोगरीब वाकया दर्ज किया है। 19वीं सदी की शुरुआत में ताजमहल के प्रति वह श्रद्धा नहीं थी जो आज है। फैनी लिखती हैं कि अंग्रेज अधिकारी और उनकी पत्नियां अक्सर पिकनिक मनाने ताजमहल जाते थे। इस दौरान वे ताजमहल के मुख्य गुंबद की छतरी और मीनारों के ऊपर चढ़कर चाय की पार्टियां करते थे और रात के समय मकबरे के मुख्य चबूतरे पर संगीत और नृत्य के आयोजन होते थे।
सैयद मुहम्मद लतीफ ने अपनी किताब आगरा हिस्टोरिकल एंड डिस्क्रिप्टिव मे लिखा है कि 1857 की क्रांति के दौरान आगरा उत्तर-पश्चिमी प्रांतों की राजधानी था। जब विद्रोह भड़का तो तमाम ब्रिटिश अधिकारियों, उनके परिवारों और सैनिकों को अपनी जान बचाने के लिए महीनों तक आगरा के किले में बंद रहना पड़ा। बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट जाने के बावजूद, सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए किले के भीतर से ही एक हस्तलिखित अखबार निकाला जाने लगा। यह एक तरह का बुलेटिन था जिसका मुख्य उद्देश्य अफवाहों को रोकना और किले में कैद लोगों तक सटीक जानकारी पहुंचाना था।
विशालकाय तोप इंग्लैंड नहीं ले जा सके तो बारूद से उड़ा दिया
आगरा के किले के बाहर यमुना के किनारे एक विशालकाय और ऐतिहासिक तोप रखी हुई थी। फैनी पार्क्स और कुछ अन्य समकालीन दस्तावेजों के अनुसार, यह तोप इतनी बड़ी थी कि इसके मुहाने में एक इंसान आसानी से बैठकर छिप सकता था। वर्ष 1830 के दशक में ब्रिटिश गवर्नर-जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिक ने इसे स्मृति चिह्न के ताैर पर इंग्लैंड भेजने की योजना बनाई लेकिन तोप का वजन इतना ज़्यादा था कि उसे ले जाने के लिए बनाई गई नाव नदी में ही डूब गई। जब अंग्रेज उसे ले जाने में विफल रहे तो उन्होंने इस अनमोल ऐतिहासिक धरोहर को बारूद से उड़ाकर इसके टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उसे बाजार में नीलाम कर दिया।
मुगलकाल में लंदन से भी बड़ा और भव्य था आगरा
अंग्रेज यात्री राल्फ फिच ने भी अपने यात्रा वृतांत में आगरा के बारे में एक रोचक बात लिखी है। फिच 1585 में (अकबर के शासनकाल में) आगरा आए थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा है कि आगरा और फतेहपुर सीकरी, दोनों ही शहर उस समय के लंदन शहर से कहीं अधिक बड़े, भव्य और घनी आबादी वाले थे। उस दौर में यूरोपीय लोगों के लिए इतनी बड़ी आबादी वाला शहर देखना किसी अचरज से कम नहीं था।