आगरा विकास प्राधिकरण (एडीए) के खेल भी निराले हैं। पहले तो शह देकर तमाम अवैध इमारतें खड़ी करवा दीं, अब एनजीटी के नोटिस के बाद खुद पर बन आई तो कार्रवाई का ‘खेल’ शुरू कर दिया है। मुश्किल यह है कि जिन इमारतों में पर्यावरण से खिलवाड़ बताकर सीलिंग की जा रही है वहां काफी हिस्से में लोग बस चुके हैं या फ्लैट-मकान बिक चुके हैं। ऐसे में इन लोगों की सांसें अटकी हुईं हैं। उधर, एडीएकर्मी वसूली कर अवैध निर्माणों के दौरान भी फायदे में रहे और सीलिंग के बाद भी।
बता दें कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के सख्त रुख के बाद एडीए अवैध निर्माणों को लेकर संकट में घिर गया है। पिछले 10 दिनों में दर्जनभर से अधिक अवैध निर्माण पर ध्वस्तीकरण और चार इमारतों में सीलिंग की कार्रवाई की जा चुकी है। इन इमारतों में एन्वायरमेंट क्लीयरेंस न होने पर सीलिंग की गई है। मगर, एडीए तब क्यों सो रहा था जब इनका निर्माण हो रहा था। दरअसल, इस सीलिंग के पीछे एडीए का बड़ा खेल है। बिल्डर कुछ विभागों से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) ले लेता है और बाकी एनओसी जल्द लेने के लिए शपथ पत्र दाखिल कर देता है। बिल्डर इन्हीं कागजों को हथियार बनाकर एडीए से इमारत का मानचित्र पास करा लेता है और निर्माण शुरू कर देता है। इस बीच सुविधा शुल्क लेकर एडीएकर्मी न तो साइट पर जाकर भौतिक निरीक्षण करते हैं और न ही फाइल खोलकर देखी जाती है। महीनों काम चलता रहता और इमारत खड़ी हो जाती है।
बिना कम्पाउंडिंग के ही खुल गईं सील
एडीए और बिल्डरों की मिलीभगत का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछले दो सालों में सवा सौ से ज्यादा भवनों में सीलिंग की गई, लेकिन इनमें से एकाद को छोड़कर नियम के तहत किसी की कम्पाउंडिंग नहीं हुई। बावजूद इसके कई भवनों की सील खुल गई। इनका कॉमर्शियल उपयोग भी हो रहा है। नियम के तहत स्वीकृत मानचित्र से यदि दस फीसदी तक अतिरिक्त निर्माण किया है तो उसकी कम्पाउंडिंग हो सकती है। सीलिंग के नाम पर खानापूर्ति हो रही है। एडीए निर्माणकर्ता को एक नोटिस देता है। इसमें उसे नियम, तारीख तक एनओसी जमा करने को कहा जाता है। ऐसे में निर्माणकर्ता संबंधित विभाग से एनओसी हासिल कर लेता है, इसके बाद सील खोल दी जाती है।
अवैध निर्माण भी ध्वस्त नहीं किए
एडीए जिन निर्माणों को पूरी तरह से अवैध घोषित कर चुका है, उन्हें भी ध्वस्त नहीं कर पा रहा है। एडीए ने ऐसे 59 अवैध निर्माणों की सूची तैयार की है, लेकिन दर्जनभर से अधिक ही ध्वस्त हो पाए हैं, वह भी एनजीटी के खौफ से।