सावन का महीना आते ही मन प्रसन्न हो जाता था। युवतियों और महिलाओं को इस माह का बेसब्री से इंतजार रहता था। नए वस्त्र पहनना, मेहंदी लगाना, झूले- झूलने का मौका जो उन्हें मिलता था।
घर-घर में पकवानों की खुशबू महकती थी। घेवर, फैनी से बाजार गुलजार हो उठते थे। मां की शादी के 14 वर्ष बाद मेरा जन्म हुआ था, तो उनका मुझसे विशेष लगाव रहा। मां सावन की तीज के एक दिन पहले अपने हाथों से मेहंदी लगाती थीं। दूसरे दिन हरे रंग के नए वस्त्र पहनाए जाते थे।
ये भी पढ़ें- अमर उजाला की पहल पर जिला बैडमिंटन चैंपियन राधा ठाकुर की मदद के लिए बढ़े हाथ
पहले घरों की चौखट पर सावन शुरू होते ही झूले डल जाते थे। चुनरी, लहरिया की साड़ी पहनकर महिलाएं मल्हार गाया करती थीं। शादी होकर आगरा आई तो सावन की और भी अर्थ और महत्व समझ आए। यहां सावन को बडे़ त्योहार के रूप में मनाया जाता था।