फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जानिये आगरा में कैसा था सावन का माहौल, घरों की चौखट पर पड़ते थे झूले...

Tue, 21 Jul 2020 01:00 PM IST
Abhishek Saxena न्यूज डेस्क, अमर उजाला, आगरा

सार

  • मंदिरों में होता था सावन की महिमा का बखान
  • घर-घर में पकवानों की खुशबू महकती थी
  • घेवर, फैनी से बाजार गुलजार हो उठते थे
विज्ञापन
प्रतिमा भार्गव, समाजसेविका - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

सावन का महीना आते ही मन प्रसन्न हो जाता था। युवतियों और महिलाओं को इस माह का बेसब्री से इंतजार रहता था। नए वस्त्र पहनना, मेहंदी लगाना, झूले- झूलने का मौका जो उन्हें मिलता था।
विज्ञापन


घर-घर में पकवानों की खुशबू महकती थी। घेवर, फैनी से बाजार गुलजार हो उठते थे। मां की शादी के 14 वर्ष बाद मेरा जन्म हुआ था, तो उनका मुझसे विशेष लगाव रहा। मां सावन की तीज के एक दिन पहले अपने हाथों से मेहंदी लगाती थीं। दूसरे दिन हरे रंग के नए वस्त्र पहनाए जाते थे।

ये भी पढ़ें- अमर उजाला की पहल पर जिला बैडमिंटन चैंपियन राधा ठाकुर की मदद के लिए बढ़े हाथ
विज्ञापन



पहले घरों की चौखट पर सावन शुरू होते ही झूले डल जाते थे। चुनरी, लहरिया की साड़ी पहनकर महिलाएं मल्हार गाया करती थीं। शादी होकर आगरा आई तो सावन की और भी अर्थ और महत्व समझ आए। यहां सावन को बडे़ त्योहार के रूप में मनाया जाता था।
विज्ञापन

मंदिरों में होता था सावन की महिमा का बखान
पहले मंदिरों में सावन के महत्व का बखान किया जाता था। बुजुर्ग महिलाएं बताती थीं कि इस दिन गौरा विरह अग्नि में तपकर शिवजी से मिली थीं और उन्होंने सोलह श्रृंगार किए थे। इस लिए सभी महिलाएं शृंगार करके कथा सुना करती थीं।

शादी के बाद पहले सावन की तीज से एक दिन पहले सासू मां ने सिंघारा दिया। जिसमें नई साड़ी, हरी चूड़ियां, मिष्ठान आदि समान था। मेरे हाथों में मेहंदी लगी होने पर पति ने अपने हाथों से मुझे खाना भी खिलाया था।

अब पहले जैसी बाद नहीं रही
समय के साथ सब बदल गया। न तो पहले जैसी परंपराएं अब रहीं और न ही उल्लास। अब लड़कियां बाहर पढ़ने चली जाती हैं और फिर नौकरी करने लग जाती हैं। ऐसे में व्यस्त दिनचर्या में उनके पास सावन मनाने का वक्त ही नहीं रहा। सोलह श्रृंगार का महत्व खत्म सा होने लगा है। भारत संस्कृति से ओत-प्रोत सावन का महीना अब फीका सा हो गया है। संस्कृति विलुप्त होती जा रही है। - प्रतिमा भार्गव, समाजसेविका
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें