बटागुर कछुओं के बच्चे चंबल नदी में छोड़ता वन दरोगा
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बेहद दुर्लभ प्रजातियों में शुमार बटागुर कछुओं को चंबल नदी जीवन दे रही है। चंबल सेंक्चुरी क्षेत्र में हैचिंग के बाद बटागुर कछुओं के 2,000 बच्चों को वापस चंबल नदी में छोड़ दिया गया। राष्ट्रीय चंबल सेंक्चुरी प्रोजेक्ट के डीएफओ ने कछुओं को नदी में छोड़ने के साथ यहां चल रहे कछुआ संरक्षण केंद्र का निरीक्षण भी किया।
राष्ट्रीय चंबल सेंक्चुरी प्रोजेक्ट और टर्टल सर्वाइवल एलायन्स (टीएसए) बाह-इटावा की सीमा के गांव गढ़ायता में कछुआ संरक्षण केंद्र के जरिए बटागुर समेत दुर्लभ प्रजातियों के कछुओं के कुनबे को बढ़ाने पर काम कर रही है।
इस सेंटर के साथ 250 बटागुर कछुए पिनाहट में, 312 मऊ में, 538 हरलालपुरा में, 285 मुकुटपुरा में, 315 गढ़ायता के अलावा इटावा में जन्मे कछुओं के बच्चे चंबल नदी में छोड़े गए। मंगलवार को चंबल सेंक्चुरी प्रोजेक्ट डीएफओ आनंद कुमार ने संरक्षण केंद्र का निरीक्षण किया और कछुओं की तादात बढ़ाने के उपायों पर चर्चा की।
संकटग्रस्त प्रजाति में शामिल हैं बटागुर कछुए
नेपाल, बांग्लादेश, वर्मा जैसे देशों में शिकार के चलते कछुओं की बटागुर प्रजाति समाप्त हो गई है। इन्हें संकट ग्रस्त प्रजाति की सूची में रखा गया है। हालांकि चंबल नदी में इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है।
कछुओं के तस्करों की नजर यहां पर है, लेकिन वन्य जीव विभाग की मानीटरिंग और घड़ियाल सेंक्चुरी के कारण बटागुर समेत अन्य क छुए बढ़ रहे हैं। बाह के रेंजर अमित सिसौदिया, इटावा के रेंजर सर्वेश भदौरिया ने बताया कि पहले दौर में बटागुर कछुओं की हैचिंग हुई है। दूसरी प्रजाति के कछुओं की भी हैचिंग शुरू हो गई है।
चंबल नदी और सेंक्चुरी क्षेत्र में जैव विविधता के कारण पक्षियों, कछुओं और घड़ियालों की संख्या बढ़ रही है। दुर्लभ बटागुर कछुओं का संरक्षण करके इनकी संख्या बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है। हैचिंग जारी है, उम्मीद है कि इस बार संख्या ज्यादा रहेगी। - आनंद कुमार, डीएफओ, राष्ट्रीय चंबल सेंक्चुरी प्रोजेक्ट